शनिवार, 18 अक्टूबर 2025

श्री स्वामी जी महाराज के अन्तिम समयकी बातें—

श्री स्वामी जी महाराज के अन्तिम समयकी बातें—  
(श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज के )
(३०) परमधाम गमनकी बातें
× × ×
    जगन्माता विविधरूपोंमें सबका पालन- पोषण करती है। भगवती श्री सीताजी जगत् की माँ (जगदम्बा) भी हैं और गुरु भी हैं। ये जीवोंका पालन-पोषण भी करती है और ज्ञान भी देती है । ये जीवों को भगवान् का प्रेम (रामस्नेह) सिखाती है और प्रेम प्रदान भी करती है।
    श्री स्वामी जी महाराज कहते हैं कि श्री रामस्नेही- सम्प्रदायकी मूल आचार्या जगज्जननी श्री सीताजी हैं।
    आपके "दीक्षागुरु" 'श्री श्री कन्हीरामजी महाराज' इसी सम्प्रदाय के संत थे। वे विक्रम संमत १९८६ में, मिगसर बदी तीज, मंगलवार को ब्रह्मलीन हुए। चाखू में उनका समाधि-स्थल है। उसके शिलालेख पर श्री स्वामी जी महाराज ने उनके निर्वाण- दिवस का यह दोहा रचकर के लिखवाया है—
संवत नवससि षडवसु बद मिगसर कुज तीज ।
कन्हीराम तनु त्यागकर भये आपु निर्बीज ॥
    'परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराज' विक्रम संवत २०६२ में, आषाढ़ बदी एकादशी की रात्रि और द्वादशीकी सुबह, रविवारको ब्राह्ममुहूर्त के अवसर पर, लगभग ३॥ (साढ़े तीन) बजे के बाद, गंगातट पर ब्रह्मलीन हुए।
तदनुसार इस पुस्तक में यह दोहा लिखा गया–
संवत नभ चख षड नयन रवि आषाढ़ बद भाण ।
स्वामि रामसुखदास जी तनु तजि भए निर्वाण ॥
    अन्तिम समयमें आपके पास संतलोग भगवन्नामका कीर्तन कर रहे थे। अन्तिम समय की हलचलमें जब आपको गंगाजल दिया गया, तब आपने अन्तिम श्वासोंके बीच में, प्राणान्त- कष्टकी परवाह न करते हुए गंगाजलका आदरपूर्वक घूँट लिया और स्थिर होकर, कोशिश करके उसको निगला भी। फिर उसी समय आपने शरीर त्यागकर भगवद्धाम प्राप्त किया। (गीता साधक-संजीवनी ८।५, ६ और २५ वें श्लोकोंकी व्याख्या के अनुसार भगवद्धाम को प्राप्त हुए)।
 प्रश्न– सुना है कि उनकी चिता- भस्म को गंगाजी समेट कर ले गई?
 उत्तर– जी हाँ, उनकी अन्तिम क्रिया गंगाजी के किनारे (गंगाजल से लगभग पाँच-दस फुट की दूरी पर) की गई थी। ( उनसे सम्बन्धित कम्बल आदि वस्तुओं को भी गंगातट पर अग्नि को समर्पित कर दिया गया जिससे कि उन वस्तुओंका दुरुपयोग न हो। अधिक जानकारी के लिये 'एक संतकी वसीयत' नामक पुस्तक पढ़ें। सन्ध्या-पूजा आदि और अन्य सामग्री गंगाजी में प्रवाहित कर दी गई।) दाहक्रिया के बाद दूसरे तीसरे दिन ही गंगाजी इतनी बढ़ी कि वहाँ के चिताभस्म आदि सब अवशेष बहाकर अपने साथ में ले गई। वहाँ की धरती ही बदल गई। भारी मात्रा में वहाँ गंगाजी की बालुका बिछ गई, गंगा किनारे गंगारज का पठार बन गया। पहलेवाला दृश्य लुप्त हो गया। मानो गंगाजी भी ऐसे अवसर को पाना चाहती थी। महापुरुषों के संग से गंगाजी भी पवित्र होती है।
    श्रीमद्भागवत में लिखा है कि राजा भगीरथ ने माता गंगा जी से मर्त्यलोक में चलने की प्रार्थना की। उस समय श्री गंगा जी बोली कि ... लोग मुझ में अपने पाप धोयेंगे। फिर मैं उस पाप को कहाँ धोऊँगी। भगीरथ! इस विषय में तुम स्वयं विचार करलो॥५॥
[इसपर राजा भगीरथ बोले कि संत- महात्माओंके संगसे आपके पाप नष्ट हो जायेंगे–]
भगीरथ उवाच
साधवो न्यासिनः शान्ता ब्रह्मिष्ठा लोकपावनाः।
हरन्त्यघं तेऽङ्गसङ्गात् तेष्वास्ते ह्यघभिद्धरिः ॥
    भगीरथने कहा – 'माता ! जिन्होंने लोक-परलोक, धन-सम्पत्ति और स्त्री-पुत्रकी कामनाका संन्यास कर दिया है, जो संसारसे उपरत होकर अपने-आपमें शान्त हैं, जो ब्रह्मनिष्ठ और लोकोंको पवित्र करनेवाले परोपकारी सज्जन हैं— वे अपने अंगस्पर्शसे तुम्हारे पापोंको नष्ट कर देंगे। क्योंकि उनके हृदयमें अघरूप अघासुरको मारनेवाले भगवान् सर्वदा निवास करते हैं॥६॥ (श्रीमद्भागवत ९।९।५,६;)।
    महापुरुषों के प्रस्थान कर जाने पर प्रकृति ने भी अपने नियम बदल दिये— दो वर्षों तक वहाँ आम के पेड़ों के फल लगने बन्द हो गये। (सुना है कि अनेक लोगों ने इस घटना को देखा है और ऐसा कहा है)। हर साल उन पेड़ों के इतने आम्रफल लगते थे कि बिक्री आदि के लिये आम ठेके पर दिये जाते थे; परन्तु उस साल वैसे लगे ही नहीं। मानो महापुरुषों के वियोग का दुख पेड़- पौधों को भी हुआ, वे इसको सह नहीं सके। गोस्वामी जी श्री तुलसीदास जी महाराज ने कहा है–
बंदउँ संत असज्जन चरना । दुखप्रद उभय बीच कछु बरना ॥
बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं । मिलत एक दुख दारुन देहीं ॥
                                                                            (रामचरितमानस १|५|३,४:)।
    अब श्री स्वामी जी महाराज इस दुनियाँ में अपनी वाणी के रूप में विराजमान हैं।
 श्री स्वामी जी महाराज की एक यह विशेष कृपा है जो उन्होंने हमलोगों को अपनी साधारण बोली (गद्य) में ज्ञान दिया। अगर कविता आदि विशेष बोली (पद्य) में देते तो हमारेको ठीक तरह से समझ में आता या नहीं– इसका पता नहीं; पर साधारण भाषा में दिया है, इसलिये हमारे सुगमता से समझ में आ जाता है।
    जैसे, आजकल अनेक संतों की वाणी पद्य में उपलब्ध है; पर हम उसको ठीक तरह से समझ नहीं पाते और श्री स्वामी जी महाराज की वाणी गद्य में है, इसलिये हम उसको सुगमता से समझ लेते हैं। इस में भी श्री स्वामी जी महाराज की एक विशेष कृपा और है। वो यह कि ‘सरलतापूर्वक लोगोंके बात समझ में आ जाय’– ऐसा उन्होंने विशेष ख्याल रखा है और प्रयत्न किया है। आपकी लिखित और रिकॉर्डिंग वाणी अधिकतर हिन्दी भाषा में है।
    संतलोग पद्य आदि में अपने अनुभव की वाणी लिखा करते हैं। यह संतोंकी रीति रही है। श्री स्वामी जी महाराज ने भी गद्य और पद्य– दोनों में अपनी वाणी लिखी है। गद्यवाली वाणी तो आपकी बहुत विशाल है (गद्यरूप में लेख और प्रवचनों की अनेक पुस्तकें हैं)। पद्यवाली वाणी (रचनाएँ) कुछ इस प्रकार है– ... 
×××
 — 'महापुरुषोंकी बातें और कहावतें' नामक पुस्तक से। 

श्री स्वामी जी महाराज के कैंसर नहीं था।

श्री स्वामी जी महाराज के कैंसर नहीं था। 
आजकल कई लोगों में एक झूठी बात फेल रही है कि श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज के गले में कैंसर था। परन्तु सच्चीबात यह है कि उनके कभी कैंसर हुआ ही नहीं था, कैंसर था ही नहीं। इस बात को ठीक तरह से समझने के लिये कृपया यह लेख पढ़ें— 
(यह लेख 'महापुरुषोंकी बातें और कहावतें' नामक पुस्तक से लिया गया है।) 

(२२) मनगढ़न्त, भ्रामक- बातोंका निराकरण
    भगवान् की, भगवान् के भक्तोंकी, संतोंकी बातें सबके लिये आनन्द मंगल करनेवाली होती हैं। इनसे बड़ा भारी लाभ होता है। इसलिये संतोंकी, भक्तोंकी बातें करनी चाहिये, उनकी कथा कहनी चाहिये और सुननी चाहिये। संत-महात्माओं के विषय में कही जानेवाली बातें सही- सही, यथार्थ होनी चाहिये। अपने मन से ही गढ़कर बातें नहीं कहनी चाहिये। 
    आजकल लोगों में कई मनगढ़न्त, भ्रमकी बातें फैल गई हैं। उनका निराकरण करके, वास्तविक बातें कहनी चाहिये और उनका प्रचार करना चाहिये। 
    'श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराज' के विषयमें, कई लोग मनगढ़न्त बातें करने लग गये हैं। जो बातें कभी हुई ही नहीं, जो बातें कल्पित हैं, झूठी हैं, जिनका कोई प्रमाण ही नहीं है– ऐसी, सुनी-सुनायी बातें लोग आगे कहने लग गये। विचार ही नहीं करते कि सही बात क्या है, उचित बात क्या है?। सच्चीबात का पता ही नहीं लगाते। 
    जैसे, आजकल लोगोंमें यह बात फैली हुई है कि श्री स्वामी जी महाराज के गलेमें कैंसर था। 
    इसके जवाबमें, निश्चयपूर्वक ‘यह’ निवेदन है कि उनके कैंसर नहीं था। उनके उम्रभरमें, कभी कैंसर हुआ ही नहीं था। लेकिन लोग बिना विचारे ही इस बात को कहते सुनते रहते हैं और यह बात चलती ही जा रही है। 
    ऐसी बात स्वयं, श्रीस्वामीजी महाराजके सामने भी आई थी। श्रीस्वामीजी महाराज हँसते हुए बोले कि एक जगह सत्संग का प्रोग्राम होनेवाला था और वो किसी कारणसे नहीं हो पाया। तब किसीने पूछा कि स्वामीजी आये नहीं? उनके आनेका प्रोग्राम था न?  तब किसीने जवाब दिया कि वो तो कैंसल (निरस्त) हो गया। तो सुननेवाला बोला कि अच्छा! कैंसर हो गया क्या? कैंसर हो गया तब कैसे आते? (उसने कैंसल की जगह कैंसर सुन लिया था)। 
    ऐसे लोग बिना विचारे ही, बिना हुई बातको ले दौड़ते हैं। जो घटना कभी घटी ही नहीं, जो व्यवहार कभी हुआ ही नहीं, ऐसी बातों को लोग कहते-सुनते रहते हैं और वे बातें आगे चलती भी रहती है। सही बातका पता लगानेवाले और कहने-सुनने वाले लोग बहुत कम होते हैं। 
    श्रीस्वामीजी महाराजके सिरपर एक फोड़ा हो गया था और उसका इलाज नहीं हो पा रहा था। उन दिनोंमें लोगोंने, उसको भी कैंसर कह दिया था; परन्तु कैंसर वो था नहीं; क्योंकि एक कम्पाउण्डरने उसको साधारण इलाजसे ही ठीक कर दिया था (वो इलाज आगे लिखा गया है)। अगर कैंसर होता, तो वो साधारण-से इलाजसे ठीक कैसे हो जाता? परन्तु बिना सोचे-समझे ही लोग कुछका कुछ कह देते हैं। अपनेको तो चाहिये कि जो बात सच्ची हो, प्रामाणिक हो, उसीको मानें।
    लोगोंने तो ऐसी झूठी खबर भी फैलादी कि श्री स्वामी जी महाराज ने शरीर छोड़ दिया। ऐसे एक बार* ही नहीं, अनेक बार हुआ है। 

*   एक बार की बात है कि मैं अपने गाँव जाकर आया था और श्री स्वामी जी महाराज को वहाँकी बातें सुना रहा था। श्री स्वामी जी महाराज बोले कि वहाँ और कोई नई बात हुई क्या? सुनते ही मेरेको वहाँ की एक घटना याद आ गई। मैंने कहा– हाँ, एक नई बात हुई थी। फिर मैंने वो घटना सुनाई जो कुछ इस प्रकार थी– मैं गाँव में एक वृद्ध माता जी से मिलने गया। वो माताजी अन्दर से आई और घूँघट निकाल कर, दूसरी तरफ मुँह किये हुए बैठ गई। वैसे तो पुरानी माताएँ लज्जाके कारण बालक को देखकर भी घूँघट निकाल लेती है, पर बालक से बात कर लेती है। श्री स्वामी जी महाराज ने भी घूँघट निकाले हुए एक वृद्ध माताजी से कहा था, कि माजी! मैं तो आपके (सामने) पौते के समान हूँ। ऐसे ही एक बार, एक वृद्ध माताजी श्री स्वामी जी महाराज से कोई बात पूछ रही थी, उनके घूँघट निकाला हुआ देखकर श्री स्वामी जी महाराज ने मेरेको भी आदरपूर्वक बताया कि देख! (माँजी के घूँघट निकाला हुआ है)। ऐसे कई माताएँ दादी, परदादी बन जानेपर भी घूँघट निकालना नहीं छोड़ती। यह उनके स्वभाव में होता है। हमारे भारतवर्ष की यह रीति है, मर्यादा है। जगज्जननी श्री सीता जी के भी घूँघट निकालनेकी बात आई है। माताएँ लज्जाके अवसर पर तो घूँघट निकालती ही है, शोकके अवसर पर भी घूँघट निकाल लेती है। यहाँ, यह माताजी शोक का अवसर जानकर घूँघट निकाले बैठी थी।  
    जब वो माताजी बोली नहीं, तब मैंने पूछा कि क्या बात है। तब वो शोक जताती हुई बोली कि क्या करें, श्री स्वामी जी महाराज ने तो समाधि ले ली अर्थात् शरीर छोड़ दिया। जब मैंने उनकी यह बात सुनी, तब मेरे समझ में आया कि इनके पास भी कोई झूठी खबर पहुँच गई है। मैंने कहा कि (नहीं माजी! ऐसी बात नहीं है) श्री स्वामी जी महाराज ने शरीर नहीं छोड़ा है, मैं वहीं से आया हूँ, वे राजीखुशी हैं। जब उन्होंने यह बात सुनी, तब शोक छोड़ा और सामान्य हुई, नहीं तो वो झूठी बात को ही सच्ची मानकर शोक पालने में लग गई थी। इस प्रकार लोग बिना सोचे-समझे ही झूठी बात फैला देते हैं और दुनियाँ को दुख देनेका काम कर देते हैं। 
    फेसबुक पर भी किसीने एक अखबार की फोटो प्रकाशित करदी, जिसमें गलेके कैंसरकी बात कही गई है। 
    गलेमें कैंसर के भ्रमवाली एक घटना तो मेरे सामनेकी ही है– 
एक बार सभा में लोगोंको मैं श्री स्वामी जी महाराज की रिकॉर्ड- वाणी (प्रवचन) सुना रहा था। प्रवचनकी आवाज कुछ लोगोंको साफ सुनाई नहीं दी। (श्रीस्वामीजी महाराज जब सभामें बोलते थे तो उन प्रवचनोंकी रिकॉर्डिंग होती थी। उस समय गलती के कारण कभी-कभी आवाज साफ रिकॉर्ड नहीं हो पाती थी। वैसे तो साफ आवाजमें उनके बहुत-सारे प्रवचन हैं, पर कुछ प्रवचनोंकी आवाज साफ नहीं है)। इसलिये समाप्ति पर किसीने कहा कि आवाज साफ नहीं थी (कई बातें पकड़में नहीं आई)। 
    उस समय मेरे बोलनेसे पहले ही एक भाई उठकर खड़ा हो गया और लोगोंकी तरफ मुँह करके बोला कि सुनो-सुनो! (फिर वो बोला–) स्वामीजीके गलेमें कैंसर था, इसलिये प्रवचन की आवाज साफ नहीं थी। 
    मैंने आक्रोश में डाँटते हुए उससे पूछा कि आपको क्या पता? तो उसने जवाब दिया कि आप (संत) लोगोंसे ही सुना है?– ऋषिकेशके संतनिवासमें से ही किसीने ऐसा कहा था (मैं उनको जानता नहीं)।} फिर मैंने उनसे कहा कि (श्री स्वामी जी महाराज के) कैंसर नहीं था। मेरे को पता है, मैं उनके साथ में रहा हुआ हूँ। यह सुनकर, उन्होंने सरलतापूर्वक हाथ जोड़ लिये कि मेरेको पता नहीं था। ऐसे, सुनी-सुनाई बात लोग आगे कह देते हैं। 
(फोड़ेका इलाज)
    श्री स्वामी जी महाराज के सिरपर जो फोड़ा हो गया था और लोगोंने जिसको कैंसर कह दिया था, उसको साधारण इलाज से इस प्रकार ठीक किया गया–
    कम्पाउण्डरजीने पट्टी बाँधनेवाला कपड़ा (गोज) मँगवाया और उसके, कैंचीसे छोटे-छोटे कई टुकड़े करवाये। फिर उनको उबाले हुए पानीमें डाल दिया गया। बादमें उनको निकालकर निचौड़ा गया और थोड़ी देरतक उनको हवामें रख दिया गया। उसके बाद फोड़ेको धोकर, उसके ऊपरका भाग (खरूँट) हटा दिया गया। फिर फोड़ेको साफ करके उसपर वे, कपड़ेके टुकड़े रख दिये। उस कपड़ेकी कतरनने फोड़ेके भीतरकी खराबी (दूषित पानी आदि) सोखकर बाहर निकाल ली। फिर वे, कपड़े हटाकर दूसरे कपड़े रखे गये। इस प्रकार, कई बार करनेपर जब अन्दरकी खराबी बाहर आ गयी तब फोड़ेपर दूसरे, स्वच्छ कपड़ेके टुकड़े रखकर उसपर पट्टी बाँधदी गई। 
    शामको जब पट्टी खोली गई तो वे, कपड़ेके टुकड़े भीगे हुए मिले; उन टुकड़ोंने अन्दरकी खराबीको खींचकर सोख लिया था, इसलिये वे भीग गये थे, गीले हो गये थे। 
    तत्पश्चात उन सबको हटाकर सुबह की तरह, फिरसे नई पट्टी बाँधी गई। दूसरे दिन सुबह भी उसी विधिसे पट्टी की गई। ऐसा प्रतिदिन किया जाने लगा। 
    बीच-बीच में यह भी ध्यान गया कि घावका मुँह बन्द न हो। अगर कभी बन्द हो भी जाता तो उसको वापस खोला जाता था जिससे कि दूषित पानी आदि पूरा बाहर आ जाय।
    इस प्रकार सोखते-सोखते कुछ दिनोंके बाद वे, कपड़ेके टुकडे भीगने बन्द हो गये। फोड़ेके भीतरकी खराबी बाहर आ गयी तथा महीनेभर बादमें, वो फोड़ा ठीक हो गया। उस जगह पर साफ, नई चमड़ी आ गई।
    इसके बाद ऐसी ही विधि दूसरे लोगोंके घाव आदिको ठीक करनेके लिये की गई और उनके भी घाव ठीक हुए।
    इससे एक बात यह समझमें आयी कि ऊपरसे दवा लगानेकी अपेक्षा भीतरकी खराबी बाहर निकालना ज्यादा ठीक रहता है।
    डॉक्टर आदि कई लोगोंने ऊपरसे दवा लगा-लगा कर ही इलाज किया था, भीतरसे विकृति निकालनेका, ऐसा उपाय उन्होंने नहीं किया था। तभी तो उनको सफलता नहीं मिली। 
    ऐसे ही, गले के कफ का इलाज भी उन्होंने सुगमतापूर्वक कर दिया–
(कफका इलाज)
    कई बार श्री स्वामी जी महाराज के सर्दी, जुकाम आदि हो जाता था, गलेमें कफ हो जाता था, जिसके कारण सत्संग के समय भी बोलने में दिक्कत आती थी।
    सत्संग सुननेमें बाधा न हो– इसके लिये कभी-कभी श्री स्वामी जी महाराज के गले में गर्म कपड़ेकी पट्टी लपेटी जाती थी और कफ डालनेके लिये दौने आदि में मिट्टी रखी जाती थी; लेकिन उसका इलाज भी कम्पाउण्डरजीने एक साधारण-से उपाय द्वारा कर दिया।
    वे बोले कि स्वामीजी महाराजके सामनेसे यह (कफदानी वाला) बर्तन हटाना है और उसका उपाय यह बताया कि लोटा भर पानीमें एक दो चिमटी (चुटकी) नमक डालकर उबाल लो। जब चौथाई भाग जल रह जाय तब अग्निसे नीचे उतार लो और ठण्डा होनेपर इनको पिलादो।
    उनके कहनेपर ऐसा ही किया गया और कुछ ही दिनोंमें श्री स्वामी जी महाराज का गला ठीक हो गया। गलेका कफ चला गया और कफ डालनेके लिये रखा जानेवाला, मिट्टीका बर्तन भी हट गया। नहीं तो वर्षोंतक यह, कफवाली समस्या बनी रही थी।
    किसीने गलेमें लपेटी हुई उस समय की पट्टी को देखकर कैंसर समझ लिया होगा अथवा, कैंसरवाली गलतफहमीकी पुष्टि की होगी तो वो भी बिना जाने, अज्ञानता के कारण थी। वास्तव में, गलेमें पट्टी कैंसर के कारण नहीं लपेटी जाती थी, गलेवाले कफके कारण लपेटी जाती थी। जब कफ चला गया, तब गला ठीक हो गया। सिरवाला फोड़ा भी ठीक हो गया था। इस प्रकार, श्री स्वामी जी महाराज के न तो कभी गलेमें कैंसर हुआ था और न सिरपर। भगवान् की कृपासे सब ठीक था। 
    लोगोंमें एक (कल्पित)बात यह भी फैली हुई है कि एक डॉक्टर ने (यन्त्र के द्वारा) श्री स्वामी जी महाराज के गलेकी जाँच की, तो उसमें, डॉक्टर को ब्रह्माण्ड दिखायी दे गया। कोई कहते हैं कि डॉक्टर को वहाँ, भगवान् के दर्शन हो गये। 
    ऐसे ही कुछ कल्पित बातें, ये भी फैली हुई हैं– कोई कहते हैं कि श्री स्वामी जी महाराज धर्म के अवतार थे, कोई सञ्जय का और कोई विदुर जी का अवतार बता देते हैं। कोई तो कह देते हैं कि ये स्वयं, श्री जीयाराम जी महाराज ही थे। परन्तु श्री स्वामी जी महाराज ने इन बातों को स्वीकार नहीं किया है। ये लोगोंकी कल्पनाएँ हैं, वास्तविकता नहीं। 
    बीकानेर धोरेपर "भृगुसंहिता" के एक फलादेशका पन्ना लाया गया और श्री स्वामी जी महाराज के सामने ही कुछ लोगोंको सुनाया गया। उस पन्ने में श्री स्वामी जी महाराज के लिये लिखा था कि यह जीव द्वापरयुग के अन्तिम समय का है ... और गीता का प्रचार करेगा। कई लोग इसका प्रमाण देकर श्री स्वामी जी महाराज को "अवतार" बता देते हैं। लेकिन उसमें किसी अवतारी का नाम नहीं लिखा था (कि ये अमुकके अवतार हैं ) और न ही किसी महात्मा का नाम लिखा था (कि ये अमुक महात्मा ही हैं)। लोग बिना सोचे-समझे और सुनी-सुनाई बात बोल देते हैं। इसलिये यह समझना चाहिये कि वास्तव में, बात क्या है। ये महात्मा तो थे; परन्तु कौन महात्मा थे– इस बात का पता नहीं है। बिना जाने इनको किन्हीका अवतार या किसी नामवाले महात्मा बता देना सच्चाई नहीं है। 
    बिना समझे किसीको अवतार मानने में लाभ भी नहीं है। श्री स्वामी जी महाराज भी अवतार न बताने में लाभ मानते हैं। क्योंकि अवतार न मानने से तो कोई हिम्मत भी कर सकता है कि ऐसा मैं भी बन सकता हूँ, ऐसे मैं भी कर सकता हूँ, आदि और अवतार मानने से वैसी हिम्मत नहीं करता – कह, वो तो अवतार थे, इसलिये उन्होंने ऐसा कर लिया, हम थोड़े ही कर सकते हैं। हम अवतार थोड़े ही हैं जो ऐसा कर सकें। हम तो साधारण जीव हैं, आदि आदि। इसलिये हमें ऐसी कल्पनावाली बातों को महत्त्व न देकर स्वयं, उन महापुरुषों द्वारा कही हुई, वास्तविक बातोंको ही महत्त्व देना चाहिये। और उनसे लाभ लेना चाहिये। 
    एक बार की बात है कि श्री स्वामी जी महाराज को 'महासती सावित्री' नामक एक पुस्तक दिखाई गई, जिसमें सावित्री को अवतार के समान बताया गया था। तब श्री स्वामी जी महाराज ने पूछा कि श्री सेठजी ने (संक्षिप्त महाभारत में) क्या लिखा है? महाभारत देखने से पता लगा कि सावित्री को इस प्रकार अवतार नहीं बताया गया है। तब श्री स्वामी जी महाराज ने बताया कि श्री सेठजी के द्वारा बनाये गये ग्रंथों में सच्चाई है। [ऐसी सच्चाई हरेक लेखक की पुस्तक में नहीं मिलती]। फिर श्री स्वामी जी महाराज ने ऐसे महापुरुषों की कृत्ति की महिमा कही और निर्देश दिया कि श्री सेठजी के द्वारा संक्षिप्त किये गये ऐसे, पद्मपुराण आदि कल्याण के विशेषांकों में जो कथाएँ आयी है, उनको अलग से, पुस्तक रूप में छपवायी जायँ। (इससे लोगों का कल्याण होगा)। उसके बाद ऐसी कई पुस्तकें छापी गई, जिनमें प्रमुख हैं– रामाश्वमेध (लवकुश चरित्र), नल-दमयन्ती, सावित्री-सत्यवान आदि। इस प्रकार यह समझाया गया कि बिना जाने किसी महात्मा या सती आदि को अवतार मानना लाभदायक नहीं है। 
    कई लोग बोल देते हैं कि स्वामीजी महाराज पढ़े हुए नहीं थे, लेकिन उनकी यह बात सर्वथा झूठी है। श्री स्वामी जी महाराज तो जोरदार पढ़े हुए थे। वे संस्कृत पाठशाला में विद्यार्थियों को संस्कृत व्याकरण पढ़ाते थे। उन्होंने एक सज्जनको छः महीनों में ही पूरी ‘लघुसिद्धान्तकौमुदी’ पढ़ा दी थी (जबकि अन्य लोगों को लघुसिद्धान्तकौमुदी पढ़ाने में कई वर्ष लग जाते हैं)। हर किसीको कम समय में अधिक पढ़ानेकी युक्ति नहीं आती है। श्री स्वामी जी महाराज को पढ़ाने की और बात समझाने की बहुत बढ़िया युक्ति आती थी। इसके सिवाय उन्होनें छहों शास्त्रों की तथा अद्वैत सिद्धान्तकी, वेदान्त की भी पढ़ाई की और आचार्य तक की परीक्षा भी दी थी। वे तो शास्त्रों से भी ऊपर उठे हुए जीवन्मुक्त महापुरुष थे। ] 
    लोगों को गीता पढ़ाने के लिये श्री स्वामी जी महाराज ने गीता- पाठशाला खोल रखी थी। 
    उन्होंने गीताजी की प्रचण्ड टीका– 'साधक संजीवनी' लिखी है जिसकी बराबरी आज दुनियाँ में कोई भी गीताजी की टीका नहीं कर सकती। ऐसे ही गीता पर शोधपूर्ण ग्रंथ– 'गीता-दर्पण' लिखा है जिसके जोड़का भी दुनियाँ में कोई ग्रंथ नहीं है। अगर श्री स्वामी जी महाराज पढ़े हुए नहीं होते, तो गीताजी की ऐसी अद्वितीय टीका कैसे लिखते?
    जिन दिनों में कल्याण का पद्मपुराणांक निकला था, उस समय पद्मपुराण की हिन्दी टीका मिली नहीं। पद्मपुराण केवल संस्कृत भाषा में ही उपलब्ध हुआ था। तब श्री स्वामी जी महाराज ने श्री सेठ जी को संस्कृत- पद्मपुराण हिन्दी में सुनाया था। स्वामी जी महाराज पद्मपुराण के संस्कृत श्लोकों का हिन्दी में अनुवाद करते और श्री सेठ जी को सुनाते थे। सुनकर श्री सेठ जी (कल्याण के विशेषांक के लिये) संशोधन करते थे कि इतना अंश ले लो, यहाँ से यहाँतक ले लो आदि। अगर श्री स्वामी जी महाराज पढ़े हुए नहीं होते तो संस्कृत को हिन्दी में कैसे सुनाते और पाठशालामें विद्यार्थियोंको संस्कृत व्याकरण कैसे पढ़ाते? ऐसी बातों से सिद्ध होता है कि श्री स्वामी जी महाराज बहुत पढ़े हुए थे। उनकी सरलताके कारण हर किसीको उनकी विद्वत्ताका पता नहीं लगता। 
    लोग बिना जाने ही कल्पित बातें करते रहते हैं। कल्पित बातें न तो महापुरुषोंको पसन्द है और न ही कोई सच्चे आदमी को। महापुरुष तो जानी हुई, यथार्थबातें, सच्ची बातें ही करते हैं तथा लाभ भी सच्ची बातों से ही होता है।
    बहुत से लोग ऐसे हैं जो श्री स्वामी जी महाराज की वास्तविक, सच्ची बातें नहीं जानते। सत्संग करनेवाले लोगों में भी, वास्तविक बातें जाननेवाले कम हैं। वास्तविक बातोंकी आवश्यकता और महत्त्व समझनेवाले लोग बहुत कम हैं।
    कुछ लोग ऐसे भी देखने-सुनने में आये हैं कि श्री स्वामी जी महाराज के विषय में कोई बात, अपने मनसे ही गढ़कर कह देते हैं। कोई सत्यबातमें असत्य मिलाकर कहते हैं। कोई तो श्री स्वामी जी महाराज की प्रशंसा करते हुए भी झूठीबात बोल देते हैं। कोई श्री स्वामी जी महाराज की बात या व्यवहार को लेकर अपनी प्रशंसा में जोड़ देते हैं। कोई अपनी हल्की सोच के अनुसार श्री स्वामी जी महाराज और श्री सेठजी जैसे महापुरुषोंके लिये भी हल्की बात कह देते हैं। ऐसी बात भी कह देते हैं जो उन महापुरुषों के स्वभाव में ही नहीं है। श्री स्वामी जी महाराज ने बताया कि एक माई मेरे लिये बचपन की बात बताती हुई बोली कि स्वामीजी जब भिक्षा लाने के लिये जाते तो (हमारे) यहाँ बोरड़ी (बेरीवृक्ष) के झोली टाँग देते और खेल में लग जाते थे। श्री स्वामी जी महाराज ने कहा कि (झूठी बात है यह, क्योंकि) ऐसे मेरे स्वभाव में ही नहीं है कि मेरे को कोई काम के लिये भेजे और मैं बीच में ही किसी दूसरे काम में लग जाऊँ, खेल में लग जाऊँ। इस प्रकार लोग सोचते नहीं कि उनके लिये यह कैसे सम्भव है। यह तो उनके स्वभाव में ही नहीं है। उनके जीवन की तरफ भी नहीं देखते, उनके रहन- सहन और सिद्धान्तों पर भी विचार नहीं करते। उनका गौरव घटाने का काम कर देते हैं।
    ऐसे महापुरुषोंके लिये, कुछ लोगोंको तो घटिया बात कहने में भी शर्म नहीं आयी। किसीने तो श्री सेठजी के लिये घटिया और झूठी बात पुस्तक में भी लिख दी। किसीने बिल्वमङ्गलकी घटनाको श्री तुलसीदास जी महाराज की घटना बता दिया। ऐसे लोग दूसरेकी घटनाको संतोंकी घटना बता देते हैं, असत्य से भी परहेज नहीं करते।
    एक लेखक तो ऐसा देखने में आया कि श्री स्वामी जी महाराज की बात अपने मन के विरुद्ध लगी या अपने आचरण के खिलाफ लगी तो उस बात को ही हटा दिया और उसकी जगह अपने दूषित मनकी बात लिख दी। इस प्रकार अपना बचाव किया। ऐसे ही कुछ लोग महापुरुषों के काम को भी अनुचित बता देते हैं।
    कोई तो श्री स्वामी जी महाराज का नाम लेकर अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं। ऐसे लोग महापुरुषोंका गौरव घटाते हैं और गलत प्रचार करते हैं। इससे महापुरुषोंकी महिमा छिपती है और दुनियाँकी बड़ी भारी हानि होती है।
 

    वास्तवमें, उनके कैंसर न तो कभी गलेमें हुआ था और न सिरपर। किसी भी अंग में कैंसर नहीं हुआ था। उनके साथमें रहनेवाले, सत्संग करनेवाले, अनेक भाई बहन ऐसे हैं, जो इस बातको जानते हैं तथा मैंने भी, वर्षोंतक श्री स्वामी जी महाराज के पासमें रहकर देखा है और बहुत नजदीक से देखा है कि उम्रभर में, उनके किसी भी अंग में, कैंसर हुआ ही नहीं था। 

      निवेदक-                                           ( डुँगरदास राम )

----------------------------------------------------------------------

    इस प्रकार श्री स्वामी जी महाराज के विषय में जब लोग बिना सोचे-समझे, मनगढ़न्त बातें करने लग गये और वास्तविक, सच्ची बातें मिलनी मुश्किल हो गई, तब यह आवश्यक समझा गया कि श्री स्वामी जी महाराज की कुछ ऐसी बातें यहाँ लिखी जायँ, जो सच्ची हों, वास्तविक हों, प्रामाणिक हों और लोगोंको उन बातों से सही मार्गदर्शन मिल सके। वे ऐसी बातें हो कि जिनके सहारे लोग दूसरी, सही बातोंका निर्णय कर सकें और मनगढ़न्त बातोंका निराकरण करके, प्रामाणिक बातें कह सकें।  
    प्रामाणिक बातें वे हैं कि जिनको स्वयं– श्री स्वामी जी महाराज ने कहा हो; क्योंकि स्वयं की बातें, स्वयं से अधिक और कौन जान सकता है? इसलिये स्वयं श्री स्वामी जी महाराज से सुनी हुई बातों के ही कुछ भाव यहाँ लिखे जा रहे हैं— ... ××× 
— 'महापुरुषोंकी बातें और कहावतें' नामक पुस्तक से। 

शुक्रवार, 22 अगस्त 2025

(१०) श्री स्वामी जी महाराज द्वारा अपनी फोटोका निषेध

(१०) श्री स्वामी जी महाराज द्वारा अपनी फोटोका निषेध
    आजकल कई लोग श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराज का नाम लिखा हुआ एक चित्र (चुपचाप) एक-दूसरेको मोबाइल आदि पर भेजने लग गये हैं। इसमें वे चश्मा लगाये हुए, दाहिने हाथके द्वारा पीछे सहारा लिये हुए और अपने एक (दाहिने) पैर पर दूसरा (बायाँ) पैर रखे हुए तथा घुटनेपर बायाँ हाथ धरे हुए दिखायी दे रहे हैं। उस चित्रके नीचे किसीने नाम लिख दिया कि ये 'रामसुखदास जी महाराज' हैं। लेकिन यह अनुचित है। श्री स्वामी जी महाराज अपने चित्र के लिये मना करते थे।
    एक बार श्री स्वामी जी महाराज से किसीने पूछा कि लोगोंको आप अपना फोटो क्यों नहीं देते हैं? कई संत तो अपनी फोटो भक्तोंको देते हैं (और वे दर्शन, पूजन आदि करते हैं) आप भी अगर अपनी फोटो लोगोंको दें, तो लोगोंको लाभ हो जाय। जवाब में श्री स्वामी जी महाराज बोले कि हमलोग अगर अपनी फोटो देने लग जायेंगे तो भगवान् की फोटो बन्द हो जायेगी। (यह काम भगवद्विरोधी है)।
    एक बार किसीने श्री स्वामी जी महाराज को उनके गुरुजी– श्री कन्नीरामजी महाराजकी फोटो दिखायी। वो फोटो श्री स्वामी जी महाराज के बालक– अवस्था के समय की है। उसमें वे अपने गुरुजीके पास खड़े हैं, हाथ जोड़े हुए हैं। उस चित्रको देखकर महाराजजीने निषेध नहीं किया। इस घटनासे कई लोग उस चित्रके चित्रको अपने पासमें रखने लग गये और दूसरोंको भी देने लग गये (कि इस चित्रके लिये श्री स्वामी जी महाराजकी मनाही नहीं है)। उस चित्रके लिये श्री स्वामी जी महाराज ने शायद इसलिये मना नहीं किया कि वो फोटो गुरुजीकी है। इस चित्रके लिये श्री स्वामी जी महाराज ने न तो हाँ कहा और न ना कहा। इसलिये इस चित्रका दर्शन कोई किसीको करवाता है अथवा कोई करने को कहता है तो घाटे-नफेकी जिम्मेदारी स्वयं– उन्हीपर है।
    कई लोगोंके मनमें रहती है कि हमने श्री स्वामीजी महाराजके दर्शन नहीं किये। अब अगर उनका चित्र भी मिल जाय तो दर्शन करलें। ऐसे लोगोंके लिये तो सत्संगियोंके भी मनमें आ जाती है कि इनको चित्रके ही दर्शन करवादें। इनकी बड़ी लगन है। लेकिन यह उचित नहीं है। अगर उचित और आवश्यक होता तो श्री स्वामीजी महाराज ऐसे लोगोंके लिये व्यवस्था कर देते। चित्र-दर्शनके लिये व्यवस्था करना और करवाना तो दूर, ऐसा करनेवालोंको भी उन्होंने मना कर दिया। इसलिये यह चित्र-दर्शन करवाना भी उचित नहीं है। अगर उचित या आवश्यक होता तो श्री स्वामी जी महाराज मना क्यों करते? क्या उस समय ऐसे लोगों की चाहना नहीं थी?
    हमने तो सुना है कि जोधपुरमें किसी सत्संगी ने श्री स्वामी जी महाराज के कई चित्र बनवाकर कई लोगोंको दे दिये। तब श्री स्वामी जी महाराज ने लोगोंसे वे फोटो वापस मँगवाये और उन सब चित्रों को जलाया गया। इसका वर्णन 'विलक्षण संत-विलक्षण वाणी' नामक पुस्तकमें भी है। इसमें श्री स्वामी जी महाराज द्वारा अपनी फोटो-प्रचारके खिलाफ लिखाये गये पत्र भी दिये गये हैं और क्यों महाराजजी वृन्दावनसे जोधपुर पधारे तथा लोगोंको क्या-क्या कहा-इसका भी वर्णन है।
    इस पुस्तकमें 'परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराज' का जोधपुरमें किये गये 'चित्र-प्रचारका दुख' भी बताया गया है। उसमें यह भी बताया गया है कि यह चित्र- प्रचार नरकोंमें जाने का रास्ता है। श्री स्वामी जी महाराज ने अपनी वसीयतमें भी चित्रका निषेध किया है। निषेध काम को करने से वंश नष्ट हो गया– यह आगेवाले प्रसंग में देखें–
(११) निषेध (वर्जित) कामको करने से भारी नुकसान, घटना
    श्री स्वामी जी महाराज बताते हैं कि महापुरुषों की बात के अनुसार जो नहीं करता है, तो (आज्ञा न माननेसे) वो उस लाभसे वञ्चित रहता है (दण्डका भागी नहीं होता) परन्तु जिसके लिये महापुरुषोंने निषेध किया है, मना किया है, उस काम को कोई करता है, उस बात को नहीं मानता है तो वो दण्ड का भागी होता है। उसको दण्ड मिलता है।
    श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज की पुरानी वसीयत (22 जनवरी 1980_8:30 बजे) की ओडियो रिकॉर्डिंग है। उसमें श्री स्वामी जी महाराज कहते हैं कि– (23 मिनट से) ... वही बात आपलोगों से कहता हूँ क आप भी उन संत- महात्माओं की आज्ञा के अनुसार जीवन बनावें, तो इससे लाभ जरूर होगा– इसमें मेरे सन्देह नहीं है। मैंने कई बातें सुणी है, जैसे– शाहपुरा के मुरलीराम जी महाराज थे। हरिपुर में जो थाम्बा है। उन्होंने ऐसा कह दिया कि मेरे पीछे स्मारक और (आदि) मत बणाणा। तो वहाँ के गृहस्थों ने जो कि अग्रवाल थे। उन्होंने चबूतरा बनाया। तो उनका बंश नष्ट हो गया। येह बात मैंने सुणी है, कहाँतक सच्ची है– परमात्मा जानें। . (प्रश्न–) ठीक है? (श्रोता–) ठीक (है)। श्री स्वामी जी महाराज– ये संत– शाहपुरा के कहते हैं कि ठीक है (सही बात है)। (प्रवचनके अंशका यथावत-लेखन).
    (25 मिनट से) मेरे साथ ऐसा अन्याय किया है लोगों ने– छिपकर के चित्र उतारा है, बड़ा अपराध मानता हूँ (यह)। एक पाप होता है, एक अपराध होता है। पाप का डण्ड भोगणे से पाप शान्त हो जाता है, पण (परन्तु) अपराध शान्त नहीं होता। अपराध तो जिसका किया जाय, वो ही अगर क्षमा करे तो हो ज्याता है, नहीं तो बड़ा बज्रपाप होता है, डण्ड होता है। अपराध होता है वो। तो ऐसे मेरे साथ में अन्याय किया है लोगों ने। और उसका अनुमोदन किया है छिप- छिपकर के बहनों और भाइयों ने। तो (वो) बड़ा दोष मानता हूँ। वो ठीक नहीं है। अर (और) मेरे साथ ऐसा अन्याय करणा नीं (नहीं) चाहिये। उससे लाभ के बदले हानि की सम्भावना है। (प्रवचनके अंशका यथावत-लेखन).
    भक्त का अपराध भगवान् भी नहीं सहते। श्री स्वामी जी महाराज की पुस्तक ‘जित देखूँ तित तू’ में लिखा है कि–
    जिस तरह भक्तिमें कपट, छल आदि बाधक होते हैं, उसी तरह भागवत – अपराध भी बाधक होता है। भगवान् अपने प्रति किया गया अपराध तो सह सकते हैं, पर अपने भक्तके प्रति किया गया अपराध नहीं सह सकते। देवताओंने मन्थरामें मतिभ्रम पैदा करके भगवान् रामको सिंहासनपर नहीं बैठने दिया तो इसको भगवान् ने अपराध नहीं माना । परन्तु जब देवताओंने भरतजीको भगवान् रामसे न मिलने देनेका विचार किया, तब देवगुरु बृहस्पतिने उनको सावधान करते हुए कहा-
सुनु सुरेस रघुनाथ सुभाऊ। निज अपराध रिसाहिं न काऊ ॥
जो अपराधु भगत कर करई। राम रोष पावक सो जरई॥
लोकहुँ बेद बिदित इतिहासा। यह महिमा जानहिं दुरबासा ॥
            (मानस, अयोध्या० २१८ २-३ )
    शंकरजी भगवान् रामके ‘स्वामी’ भी हैं, ‘दास’ भी हैं और ‘सखा’ भी हैं—‘सेवक स्वामि सखा सिय पी के’ (मानस, बाल० १५ । २) । इसलिये शंकरजीसे द्रोह करनेवालेके लिये भगवान् राम कहते हैं—
सिव द्रोही मम भगत कहावा । सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा ॥
संकर बिमुख भगति चह मोरी । सो नारकी मूढ़ मति थोरी ॥
संकरप्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास ।
ते नर करहिं कलप भरि घोर नरक महुँ बास ॥ (मानस, लंका० २।४, २)
अतः साधकको इस भागवत अपराधसे बचना चाहिये। (‘जित देखूँ तित तू’, पृष्ठ २३,२४;)।
महापुरुषों ने चित्र के लिये मना किया है। इसलिये उनके चित्र का प्रचार न करें।
    इस प्रकार यह समझ लेना चाहिये कि श्रीस्वामीजी महाराज ने जिस वस्तु को पूजा अथवा स्मृतिरूप में रखने के लिये मना किया है, वो न रखें। किसी वस्तु, स्थान, कमरा, स्टेज आदि को इस प्रकार महत्त्व न दें जिससे लोगों को स्मृतिरूप में रखने आदि की प्रेरणा मिले। दूसरे लोग ऐसी भूल करे तो उनको भी प्रेम से समझाने की कोशिश करें।
— 'महापुरुषोंकी बातें और कहावतें' नामक पुस्तक से

(९) श्री सेठजी द्वारा अपने चित्रका निषेध-



(९) श्री सेठजी द्वारा अपने चित्रका निषेध-
    ऐसे ही सेठजी श्री जयदयालजी गोयन्दका भी अपने चित्र-प्रचार के लिए मना करते थे। श्री सेठ जी ने एक प्रसिद्ध संत से कहा कि आप लोगोंको अपनी फोटो देते हो, इसमें आपका भला है या लोगोंका? सुनकर उनको चुप होना पड़ा, जवाब नहीं आया।  
    कहते हैं कि एक बार किसी ने श्री सेठ जी से निवेदन किया कि हम आपका फोटो खींचना चाहते हैं। सुनकर श्री सेठ जी बोले कि पहले मेरे सिरपर जूती बाँध दो और फिर (सिरपर बँधी हुई जूती समेत फोटो) खींच लो। ऐसा जवाब सुनकर फोटो के लिये कहने वाले समझ गये कि इनको अपनी फोटो बिल्कुल पसन्द नहीं है। कोई फोटो लेता है तो इनको कितना बुरा लगता है। 
    (यहाँ श्री सेठ जी के एक प्रवचन का कुछ अंश दिया जा रहा है, जिसमें उन्होंने भाईजी और अपने स्मारक का निषेध किया है। इसमें भाईजी और श्री सेठ जी के चित्र का निषेध भी पढ़ना चाहिये–) 
   नाम तथा रूपकी पूजा कल्याणमें बाधक 
( परमश्रद्धेय सेठ जी श्री जयदयाल जी गोयन्दका द्वारा दिनांक-३०-३- १९४१, प्रातःकाल, श्रीजीका बगीचा, वृन्दावन में दिये गये प्रवचनका अंश—)
    मनुष्यके ऊपर उठनेमें मान-बड़ाईकी इच्छा बहुत बाधक होती है। मरनेपर मेरा नाम चले। इसी स्मृतिके लिये लोग स्मारक बनाते हैं। यह मामला गड़बड़ मालूम देता है। प्रायः यह बहुतोंमें ही रहता है। अच्छे-अच्छे साधु, नेता इस तरहकी व्यवस्था करते हैं कि स्मृति रहे। यह अन्धकारकी बात है।
    कहनेका विशेष उद्देश्य यह है कि मैं या भाईजी मर जायँ तो पीछेसे किसीको हमलोगोंके लिये कोई स्मृति या स्मारक नहीं बनवाना चाहिये। मरनेके बाद मैं कहने कैसे आऊँगा । अतः अभीसे कह देता हूँ। भाईजीके लिये भी मैं कहता हूँ।
    भगवच्चर्चा के लिये यह निषेध नहीं है। व्यक्तिगत नाम और रूपकी पूजाकी बात है। नाम, रूप तो मिटा ही दे।
    प्रारम्भमें एक दो पुस्तकें तैयार हुईं तो मैंने नाम देनेका निषेध किया था। पीछे लेखोंमें भाईजीने छाप दिया और लेखोंकी पुस्तकें बन गयीं। इसके सिवा और किसी रूपमें नाम, रूपका प्रचार नहीं होने दें।
    फोटो पूजना रूपकी पूजा है। स्मारक बनाना नामको पूजना है। ज्ञानी या भक्त कोई भी हो, जिनका नाम रूप प्रचलित होता है, लोग कहते हैं, यदि उनका वास्तवमें विरोध होता तो उनके अनुयायी लोग उनके नाम, रूपकी पूजा क्यों करते ?
    हमारे मरनेपर कोई हमारे लिये शोक सभा न करे। नाम, रूप कायम रखनेकी कोई चेष्टा न करे। जो लोग हमारे इस भावका प्रचार करेंगे वे ही हमारे अनुयायी हैं।
    मंगलनाथजीमें जितनी मेरी श्रेष्ठ बुद्धि थी या है, उतनी मेरे जीवनमें किसी जीवित मनुष्यमें नहीं हुई। पर मैं उनके नाम व चित्रका प्रचार नहीं करता। उनके सिद्धान्तोंका प्रचार करता हूँ।
    व्याख्यानके समय उनकी स्मृति हो जाती है, उनकी युक्तियोंका खयाल करके बातें भी कही जाती हैं, पर उनके नाम, रूपका प्रचार मैं कभी नहीं करता। उनका जो भाव था, उसीका हमें प्रचार करना चाहिये। यदि यह बात कही जाय कि उनके द्वारा मनाही की बात यों ही कहनामात्र था तो इसमें तीन दोष आते हैं- झूठ, कपट और दम्भ । 
    मेरा चित्र मेरे घर में है। यदि मेरा शरीर पहले शांत हो जय, मेरी स्त्री उसे रखना चाहे तो मेरा विरोध नहीं है, पर चित्र घरके बाहर न निकले। मुझे पूरा भरोसा है कि हरिकृष्ण या शिवदयाल कभी उस चित्रकी नकल किसीको नहीं लेने देंगे। एक चित्र श्री ज्वालाप्रसादजीके पास है। उनसे प्राप्त करनेकी पहले बहुत चेष्टा की गयी पर उनसे बहुत प्रेम था, उन्होंने नहीं दिया, यदि उनसे लिया जाय तो उनको बहुत दुःख होगा। इस कारण विचार होता है।
    प्रश्न- भक्त या ज्ञानी किस दृष्टिसे ऐसी बात चाहते हैं?
    उत्तर- भक्त तो अपने स्वामीकी ही पूजा चाहता है, उसीके नामका प्रचार चाहता है। वह नौकर नालायक है, बेईमान है, भगवान्‌को धोखा दे रहा है, जो भगवान्‌के बदले में अपने नाम- रूपको पुजवाता है। मालिककी दुकानपर अपना नाम चलानेवाला नौकर क्या मालिकको अच्छा लग सकता है। भगवान्‌के भक्तको भगवान के नाम, रूप, गुणका प्रचार करना चाहिये।
    मनुष्यके क्षणभङ्गुर, नाशवान् शरीरको पुजवानेसे क्या लाभ? मेरा पाँच वर्ष पहलेका चित्र यदि हो तो उसमें और आजके चित्रमें कितना अन्तर होगा। ऐसे ही सभी चित्रोंमें कौन-सा सच्चा है? कोई नहीं। 
   भगवान्‌का रूप-नाम कितना मधुर है। यदि पहले जन्मका मेरा चित्र कहीं पूजा जाता हो तो उससे मुझे क्या लाभ हो रहा है। मेरी पुस्तकोंमें, लेखोंमें, भगवान् विष्णु, राम, कृष्णकी ही प्रशंसा मिलेगी। यदि भक्तोंके चित्रोंकी प्रचारकी दृष्टि होती तो मंगलनाथजी महाराजके चित्रका खूब प्रचार करते। 
    ज्ञानीकी दृष्टिसे बतलाया जाता है। पूजनकी दृष्टिसे पूजे तो उसे छोटा बना रहा है। ज्ञानी तो ब्रह्म ही हो गया, साक्षात् परमात्मा हो गया। पूजक लोग उसे छोटा बना रहे हैं। उसे महात्मा कह रहे हैं, उसे ब्रह्मसे न्यारा कर रहे हैं। उसके नाम, रूपको ब्रह्मसे अलग निकाल रहे हैं।
   महात्माकी दृष्टिसे यदि वह अपने नाम, रूपकी पूजा चाहता है तो वह ब्रह्मको प्राप्त ही नहीं हुआ। अपने वर्तमान नाम, रूपमें उसका अभिमान है, तभी वह उसकी पूजा चाहता है, अन्यथा उसे यही समझना चाहिये कि राम, कृष्णका नाम, मेरा ही नाम है। उनकी पूजा मेरी ही पूजा है। यदि वह अलग नाम, रूपकी पूजा चाहता है तो राम, कृष्णसे अपनेको अलग मानता है। यदि मैं जयदयालके नाम, रूपसे आप लोगोंका लाभ समझता हूँ, आपको पूजक और अपनेको पूज्य समझता हूँ तो देहाभिमान और किसका नाम है।
    स्त्री पतिकी, पुत्र माता-पिताकी पूजा करे, यह लाभकी बात है। परमात्मा सबसे ऊँचे हैं। अपनी श्रद्धासे अपने गुरुको ईश्वर तुल्य मान सकता है, पर ईश्वर नहीं । अन्यथा यह ईश्वरको मटियामेट करनेकी-सी बात है। यह सिद्धान्तकी बात है । नहीं तो इतने ईश्वर खडे हो जायँगे कि आपको वास्तविक ईश्वरका पता लगाना कठिन हो जायगा। 
   दम्भ-पाखण्डके पेटमें मान-बड़ाई या धनकी इच्छा ही है। जितने काम विश्वमें भगवान्‌के विरुद्ध हो रहे हैं, उनसे भगवान् प्रसन्न नहीं हैं। अधिकार दे दिया। लोग भगवान्‌का दुरुपयोग कर रहे हैं, अतः दण्ड मिलेगा। आगे अधिकार नहीं रहेगा। बन्दूक छीन ली जायगी। अच्छा काम करेगा, उसे दुबारा बन्दूक मिल जायगी और पुरस्कार भी मिलेगा।
    हरेकमें यह बात आ जानी चाहिये कि भगवान् के मन्दिरमें भगवान्‌की जगहपर किसी मनुष्यकी पूजा करनी यह घृणा करने योग्य बात है। यदि उन महात्माओंने स्वयं इस प्रकारका प्रचार करवाया है, तब तो वे महात्मा ही नहीं थे। यदि उनके अनुयायियोंने उनकी बात न मानकर यह प्रचार किया है तो उन्होंने उस महात्माका सिद्धान्त नहीं समझा।
    यह सिद्धान्तकी बात है, हम सोचेंगे तो हमको प्रिय लगेगी, बड़ी ठोस बात है। सत्य बोलना चाहिये, परस्त्रीको माँके समान समझना चाहिये। ठोस सिद्धान्तकी बात है। 
    अन्यायसे धन अर्जित करनेवाला लोभी ही नहीं, अपितु पापी भी है। न्यायसे अर्जित करनेवाला भी लोभी है। जहाँ खर्च करना न्याय हो वहाँ खर्च नहीं करता, वह भी लोभी है। वैराग्यवान् हो तो न्यायसे भी अर्जित होना उसे अच्छा नहीं लगता।
    दूसरी स्त्रीपर कुदृष्टि जाना तो पाप है ही, अपनी स्त्रीके साथ भी अन्याययुक्त भोग भोगना पाप ही है। न्याययुक्त भोग शास्त्र प्रणालीसे हो, वहाँ भी यदि भोग-बुद्धि है, वह काम तो है ही ।पापका अभाव है, पर कामका अभाव नहीं है। वहाँ वैराग्य कहाँ। 
    अनुचित क्रोध पाप रूप है। स्त्री बालकोंको शिक्षा देनेके लिये यदि न्याययुक्त क्रोध हो, उसमें आपत्ति नहीं है। वह भी यदि वास्तवमें क्रोध है तो वह दोष ही है। क्रोधका अभिनय हो
तो आपत्ति नहीं।
    सूक्ष्म काम, क्रोध भी स्थूल होकर गिरानेमें हेतु बन सकते हैं, अतः इनकी जड़ काट डालनी चाहिये ।
    काम, क्रोध, लोभ – यह सब बातें खूब अच्छी तरह अनुभव की हुई हैं। काम-क्रोध-लोभ खूब बाधा डालते रहे हैं । प्रकृति लोगोंकी भिन्न-भिन्न रहती है, पर सबसे अधिक बलवान् काम है। मेरेपर कामका जोर अधिक रहा, क्रोधका जोर नहीं रहा । लोभके लिये बीचकी स्थिति रही ।
    किसी भी भक्तका भक्तके रूपमें प्रचार होना कोई आपत्तिकी बात नहीं है। उनके आचरण, गुण, क्रिया, सिद्धान्त, उपदेश, कथन – इनको जितना स्वयं धारण कर सके, दूसरोंमें करवा सके, उसके समान उस महात्माको कोई प्रिय नहीं होता । उसके माता-पिता एवं प्राण भी उसे इतने प्रिय नहीं लगते, जितना प्रिय वह सिद्धान्तका प्रचारक लगता है। भगवान् स्वयं कहते हैं— 
        न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः। 
        भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥                                                (गीता १८ । ६९)
      उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करनेवाला मनुष्योंमें कोई भी नहीं है; तथा पृथ्वीभरमें उससे बढ़कर मेरा प्रिय दूसरा कोई भविष्यमें होगा भी नहीं । 
    नाम और रूप तो भगवान् का ही प्रचार करनेके योग्य है। सिद्धान्त भगवान् का ही है। गीताके वचन स्वयं भगवान्‌के ही वचन हैं। गीताकी बातें जो मेरी समझमें आयी हैं, वे बातें कही जाती हैं। उनका पालन करनेवालेके उद्धार में कोई शंकाकी बात नहीं है। मेरे नाम, रूपकी पूजाकी कोई बात करे तो उसका मैं विरोध ही करूँगा। 
    सिद्धान्तकी बातको काममें लानेवालेके उद्धार होनेमें कोई शंकाकी बात नहीं, किन्तु कहनेवाले इस शरीरकी, वक्ताकी कोई पूजा करे, इसकी सेवा करे, आश्रय ले, उसके लिये मैं पाव आने भर भी उत्तरदायी नहीं हूँ । उसका कोई हित होगा, यह बात नहीं कही जा सकती। मैं एक तुच्छ मनुष्य हूँ। भगवान् ने रामायणमें, गीतामें जो बातें कही हैं, उनकी ओर ध्यान देना चाहिये । 
    भगवान् के नाम-रूपकी तरह कोई मनुष्य अपनी पूजा कराने लगे तो यह पतनका ही मार्ग है। यदि कोई कहे कि गुरु परम्पराकी रक्षा करनेके लिये मैं ऐसा करता हूँ, हमें यह ठेका क्यों लेना चाहिये। रक्षा करनेवाला अपने आप करेगा। यह सिद्धान्तकी बातें हैं । सिद्धान्तका ही डाली पत्ता है, उसीका अंश है।
    मेरे एक साथी चरण धोकर पिलाना तथा जुठन खिलाना आदि व्यवहार करते थे, उनका पतन हो गया। हमलोगोंको भगवान् शिक्षा दे रहे हैं कि तुमलोग खूब सावधान रहो। हम भी यदि नहीं चेतते तो हमारी यह दशा होती। मैं यदि एकान्तमें भी इनको कुछ भी गुंजाइश दूँ तो सभामें इनका ऐसा विरोध कैसे कर सकता हूँ।
    मैं और स्वामीजी ऋषीकेश सत्संगमें जाते हैं। लोगोंके आग्रहवश लोगोंके तथा मेरे रुपये सब मिलाकर साधुओंको अन्न, वस्त्र आदि बाँटनेका काम किया जाता है। ऐसा काम करना स्वामीजीके लिये तो बिलकुल ठीक नहीं है। मेरे लिये भी यह दो नम्बरका काम है। पर यह काम जुड़ गया है। पीछे वो समझमें आ गयी। किसी प्रकार भी लोगोंसे रुपयोंका सम्बन्ध न जुड़ना ही ठीक है । बीचमें दलाल न बनें। किसीको आवश्यकता हो, वह स्वयं ही जाकर लगा दे। अपने स्वयंके रुपये हो तो लगा दे, दूसरोंसे सम्बन्ध न जोड़े।
    बहुत पहले मैं लोगोंके उपकारके लिये माँगकर लाता था। तीस वर्ष पहलेकी बात है । चक्रधरपुरमें एक साधुको कम्बल दिलानेके लिये हरिकृष्णको कुछ रुपये जमा करनेके लिये भेजा । एकने कहा कि आप साथ आ गये, अतः जो कुछ देते हैं, वह आपको ही देते हैं। हरिकृष्णको यह बात बुरी लगी कि आगे से अपने पास हो वह दो, किन्तु माँगने मत जाओ ।
    बादमें यह भी शिक्षा मिली। मेरे कुछ धनी मित्र कह देते, तेरे जँचे उस अच्छे काममें हमारा रुपया भी लगा देना। उसमें भी उलाहना मिला कि इसलिये भार थोड़े ही दिया था कि इतना लिखा दें। तबसे कोई भार दे तो स्पष्ट कह दिया जाता है कि भार उठाने लायक मैं नहीं हूँ । 
××× 
(—‘भगवत्प्राप्तिकी अमूल्य बातें’ नामक पुस्तक के ‘नाम तथा रूपकी पूजा कल्याणमें बाधक’ नामक लेख से।)
— 'महापुरुषोंकी बातें और कहावतें' नामक पुस्तक से