शनिवार, 18 अक्टूबर 2025

श्री स्वामी जी महाराज के अन्तिम समयकी बातें—

श्री स्वामी जी महाराज के अन्तिम समयकी बातें—  
(श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज के )
(३०) परमधाम गमनकी बातें
× × ×
    जगन्माता विविधरूपोंमें सबका पालन- पोषण करती है। भगवती श्री सीताजी जगत् की माँ (जगदम्बा) भी हैं और गुरु भी हैं। ये जीवोंका पालन-पोषण भी करती है और ज्ञान भी देती है । ये जीवों को भगवान् का प्रेम (रामस्नेह) सिखाती है और प्रेम प्रदान भी करती है।
    श्री स्वामी जी महाराज कहते हैं कि श्री रामस्नेही- सम्प्रदायकी मूल आचार्या जगज्जननी श्री सीताजी हैं।
    आपके "दीक्षागुरु" 'श्री श्री कन्हीरामजी महाराज' इसी सम्प्रदाय के संत थे। वे विक्रम संमत १९८६ में, मिगसर बदी तीज, मंगलवार को ब्रह्मलीन हुए। चाखू में उनका समाधि-स्थल है। उसके शिलालेख पर श्री स्वामी जी महाराज ने उनके निर्वाण- दिवस का यह दोहा रचकर के लिखवाया है—
संवत नवससि षडवसु बद मिगसर कुज तीज ।
कन्हीराम तनु त्यागकर भये आपु निर्बीज ॥
    'परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराज' विक्रम संवत २०६२ में, आषाढ़ बदी एकादशी की रात्रि और द्वादशीकी सुबह, रविवारको ब्राह्ममुहूर्त के अवसर पर, लगभग ३॥ (साढ़े तीन) बजे के बाद, गंगातट पर ब्रह्मलीन हुए।
तदनुसार इस पुस्तक में यह दोहा लिखा गया–
संवत नभ चख षड नयन रवि आषाढ़ बद भाण ।
स्वामि रामसुखदास जी तनु तजि भए निर्वाण ॥
    अन्तिम समयमें आपके पास संतलोग भगवन्नामका कीर्तन कर रहे थे। अन्तिम समय की हलचलमें जब आपको गंगाजल दिया गया, तब आपने अन्तिम श्वासोंके बीच में, प्राणान्त- कष्टकी परवाह न करते हुए गंगाजलका आदरपूर्वक घूँट लिया और स्थिर होकर, कोशिश करके उसको निगला भी। फिर उसी समय आपने शरीर त्यागकर भगवद्धाम प्राप्त किया। (गीता साधक-संजीवनी ८।५, ६ और २५ वें श्लोकोंकी व्याख्या के अनुसार भगवद्धाम को प्राप्त हुए)।
 प्रश्न– सुना है कि उनकी चिता- भस्म को गंगाजी समेट कर ले गई?
 उत्तर– जी हाँ, उनकी अन्तिम क्रिया गंगाजी के किनारे (गंगाजल से लगभग पाँच-दस फुट की दूरी पर) की गई थी। ( उनसे सम्बन्धित कम्बल आदि वस्तुओं को भी गंगातट पर अग्नि को समर्पित कर दिया गया जिससे कि उन वस्तुओंका दुरुपयोग न हो। अधिक जानकारी के लिये 'एक संतकी वसीयत' नामक पुस्तक पढ़ें। सन्ध्या-पूजा आदि और अन्य सामग्री गंगाजी में प्रवाहित कर दी गई।) दाहक्रिया के बाद दूसरे तीसरे दिन ही गंगाजी इतनी बढ़ी कि वहाँ के चिताभस्म आदि सब अवशेष बहाकर अपने साथ में ले गई। वहाँ की धरती ही बदल गई। भारी मात्रा में वहाँ गंगाजी की बालुका बिछ गई, गंगा किनारे गंगारज का पठार बन गया। पहलेवाला दृश्य लुप्त हो गया। मानो गंगाजी भी ऐसे अवसर को पाना चाहती थी। महापुरुषों के संग से गंगाजी भी पवित्र होती है।
    श्रीमद्भागवत में लिखा है कि राजा भगीरथ ने माता गंगा जी से मर्त्यलोक में चलने की प्रार्थना की। उस समय श्री गंगा जी बोली कि ... लोग मुझ में अपने पाप धोयेंगे। फिर मैं उस पाप को कहाँ धोऊँगी। भगीरथ! इस विषय में तुम स्वयं विचार करलो॥५॥
[इसपर राजा भगीरथ बोले कि संत- महात्माओंके संगसे आपके पाप नष्ट हो जायेंगे–]
भगीरथ उवाच
साधवो न्यासिनः शान्ता ब्रह्मिष्ठा लोकपावनाः।
हरन्त्यघं तेऽङ्गसङ्गात् तेष्वास्ते ह्यघभिद्धरिः ॥
    भगीरथने कहा – 'माता ! जिन्होंने लोक-परलोक, धन-सम्पत्ति और स्त्री-पुत्रकी कामनाका संन्यास कर दिया है, जो संसारसे उपरत होकर अपने-आपमें शान्त हैं, जो ब्रह्मनिष्ठ और लोकोंको पवित्र करनेवाले परोपकारी सज्जन हैं— वे अपने अंगस्पर्शसे तुम्हारे पापोंको नष्ट कर देंगे। क्योंकि उनके हृदयमें अघरूप अघासुरको मारनेवाले भगवान् सर्वदा निवास करते हैं॥६॥ (श्रीमद्भागवत ९।९।५,६;)।
    महापुरुषों के प्रस्थान कर जाने पर प्रकृति ने भी अपने नियम बदल दिये— दो वर्षों तक वहाँ आम के पेड़ों के फल लगने बन्द हो गये। (सुना है कि अनेक लोगों ने इस घटना को देखा है और ऐसा कहा है)। हर साल उन पेड़ों के इतने आम्रफल लगते थे कि बिक्री आदि के लिये आम ठेके पर दिये जाते थे; परन्तु उस साल वैसे लगे ही नहीं। मानो महापुरुषों के वियोग का दुख पेड़- पौधों को भी हुआ, वे इसको सह नहीं सके। गोस्वामी जी श्री तुलसीदास जी महाराज ने कहा है–
बंदउँ संत असज्जन चरना । दुखप्रद उभय बीच कछु बरना ॥
बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं । मिलत एक दुख दारुन देहीं ॥
                                                                            (रामचरितमानस १|५|३,४:)।
    अब श्री स्वामी जी महाराज इस दुनियाँ में अपनी वाणी के रूप में विराजमान हैं।
 श्री स्वामी जी महाराज की एक यह विशेष कृपा है जो उन्होंने हमलोगों को अपनी साधारण बोली (गद्य) में ज्ञान दिया। अगर कविता आदि विशेष बोली (पद्य) में देते तो हमारेको ठीक तरह से समझ में आता या नहीं– इसका पता नहीं; पर साधारण भाषा में दिया है, इसलिये हमारे सुगमता से समझ में आ जाता है।
    जैसे, आजकल अनेक संतों की वाणी पद्य में उपलब्ध है; पर हम उसको ठीक तरह से समझ नहीं पाते और श्री स्वामी जी महाराज की वाणी गद्य में है, इसलिये हम उसको सुगमता से समझ लेते हैं। इस में भी श्री स्वामी जी महाराज की एक विशेष कृपा और है। वो यह कि ‘सरलतापूर्वक लोगोंके बात समझ में आ जाय’– ऐसा उन्होंने विशेष ख्याल रखा है और प्रयत्न किया है। आपकी लिखित और रिकॉर्डिंग वाणी अधिकतर हिन्दी भाषा में है।
    संतलोग पद्य आदि में अपने अनुभव की वाणी लिखा करते हैं। यह संतोंकी रीति रही है। श्री स्वामी जी महाराज ने भी गद्य और पद्य– दोनों में अपनी वाणी लिखी है। गद्यवाली वाणी तो आपकी बहुत विशाल है (गद्यरूप में लेख और प्रवचनों की अनेक पुस्तकें हैं)। पद्यवाली वाणी (रचनाएँ) कुछ इस प्रकार है– ... 
×××
 — 'महापुरुषोंकी बातें और कहावतें' नामक पुस्तक से। 

श्री स्वामी जी महाराज के कैंसर नहीं था।

श्री स्वामी जी महाराज के कैंसर नहीं था। 
आजकल कई लोगों में एक झूठी बात फेल रही है कि श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज के गले में कैंसर था। परन्तु सच्चीबात यह है कि उनके कभी कैंसर हुआ ही नहीं था, कैंसर था ही नहीं। इस बात को ठीक तरह से समझने के लिये कृपया यह लेख पढ़ें— 
(यह लेख 'महापुरुषोंकी बातें और कहावतें' नामक पुस्तक से लिया गया है।) 

(२२) मनगढ़न्त, भ्रामक- बातोंका निराकरण
    भगवान् की, भगवान् के भक्तोंकी, संतोंकी बातें सबके लिये आनन्द मंगल करनेवाली होती हैं। इनसे बड़ा भारी लाभ होता है। इसलिये संतोंकी, भक्तोंकी बातें करनी चाहिये, उनकी कथा कहनी चाहिये और सुननी चाहिये। संत-महात्माओं के विषय में कही जानेवाली बातें सही- सही, यथार्थ होनी चाहिये। अपने मन से ही गढ़कर बातें नहीं कहनी चाहिये। 
    आजकल लोगों में कई मनगढ़न्त, भ्रमकी बातें फैल गई हैं। उनका निराकरण करके, वास्तविक बातें कहनी चाहिये और उनका प्रचार करना चाहिये। 
    'श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराज' के विषयमें, कई लोग मनगढ़न्त बातें करने लग गये हैं। जो बातें कभी हुई ही नहीं, जो बातें कल्पित हैं, झूठी हैं, जिनका कोई प्रमाण ही नहीं है– ऐसी, सुनी-सुनायी बातें लोग आगे कहने लग गये। विचार ही नहीं करते कि सही बात क्या है, उचित बात क्या है?। सच्चीबात का पता ही नहीं लगाते। 
    जैसे, आजकल लोगोंमें यह बात फैली हुई है कि श्री स्वामी जी महाराज के गलेमें कैंसर था। 
    इसके जवाबमें, निश्चयपूर्वक ‘यह’ निवेदन है कि उनके कैंसर नहीं था। उनके उम्रभरमें, कभी कैंसर हुआ ही नहीं था। लेकिन लोग बिना विचारे ही इस बात को कहते सुनते रहते हैं और यह बात चलती ही जा रही है। 
    ऐसी बात स्वयं, श्रीस्वामीजी महाराजके सामने भी आई थी। श्रीस्वामीजी महाराज हँसते हुए बोले कि एक जगह सत्संग का प्रोग्राम होनेवाला था और वो किसी कारणसे नहीं हो पाया। तब किसीने पूछा कि स्वामीजी आये नहीं? उनके आनेका प्रोग्राम था न?  तब किसीने जवाब दिया कि वो तो कैंसल (निरस्त) हो गया। तो सुननेवाला बोला कि अच्छा! कैंसर हो गया क्या? कैंसर हो गया तब कैसे आते? (उसने कैंसल की जगह कैंसर सुन लिया था)। 
    ऐसे लोग बिना विचारे ही, बिना हुई बातको ले दौड़ते हैं। जो घटना कभी घटी ही नहीं, जो व्यवहार कभी हुआ ही नहीं, ऐसी बातों को लोग कहते-सुनते रहते हैं और वे बातें आगे चलती भी रहती है। सही बातका पता लगानेवाले और कहने-सुनने वाले लोग बहुत कम होते हैं। 
    श्रीस्वामीजी महाराजके सिरपर एक फोड़ा हो गया था और उसका इलाज नहीं हो पा रहा था। उन दिनोंमें लोगोंने, उसको भी कैंसर कह दिया था; परन्तु कैंसर वो था नहीं; क्योंकि एक कम्पाउण्डरने उसको साधारण इलाजसे ही ठीक कर दिया था (वो इलाज आगे लिखा गया है)। अगर कैंसर होता, तो वो साधारण-से इलाजसे ठीक कैसे हो जाता? परन्तु बिना सोचे-समझे ही लोग कुछका कुछ कह देते हैं। अपनेको तो चाहिये कि जो बात सच्ची हो, प्रामाणिक हो, उसीको मानें।
    लोगोंने तो ऐसी झूठी खबर भी फैलादी कि श्री स्वामी जी महाराज ने शरीर छोड़ दिया। ऐसे एक बार* ही नहीं, अनेक बार हुआ है। 

*   एक बार की बात है कि मैं अपने गाँव जाकर आया था और श्री स्वामी जी महाराज को वहाँकी बातें सुना रहा था। श्री स्वामी जी महाराज बोले कि वहाँ और कोई नई बात हुई क्या? सुनते ही मेरेको वहाँ की एक घटना याद आ गई। मैंने कहा– हाँ, एक नई बात हुई थी। फिर मैंने वो घटना सुनाई जो कुछ इस प्रकार थी– मैं गाँव में एक वृद्ध माता जी से मिलने गया। वो माताजी अन्दर से आई और घूँघट निकाल कर, दूसरी तरफ मुँह किये हुए बैठ गई। वैसे तो पुरानी माताएँ लज्जाके कारण बालक को देखकर भी घूँघट निकाल लेती है, पर बालक से बात कर लेती है। श्री स्वामी जी महाराज ने भी घूँघट निकाले हुए एक वृद्ध माताजी से कहा था, कि माजी! मैं तो आपके (सामने) पौते के समान हूँ। ऐसे ही एक बार, एक वृद्ध माताजी श्री स्वामी जी महाराज से कोई बात पूछ रही थी, उनके घूँघट निकाला हुआ देखकर श्री स्वामी जी महाराज ने मेरेको भी आदरपूर्वक बताया कि देख! (माँजी के घूँघट निकाला हुआ है)। ऐसे कई माताएँ दादी, परदादी बन जानेपर भी घूँघट निकालना नहीं छोड़ती। यह उनके स्वभाव में होता है। हमारे भारतवर्ष की यह रीति है, मर्यादा है। जगज्जननी श्री सीता जी के भी घूँघट निकालनेकी बात आई है। माताएँ लज्जाके अवसर पर तो घूँघट निकालती ही है, शोकके अवसर पर भी घूँघट निकाल लेती है। यहाँ, यह माताजी शोक का अवसर जानकर घूँघट निकाले बैठी थी।  
    जब वो माताजी बोली नहीं, तब मैंने पूछा कि क्या बात है। तब वो शोक जताती हुई बोली कि क्या करें, श्री स्वामी जी महाराज ने तो समाधि ले ली अर्थात् शरीर छोड़ दिया। जब मैंने उनकी यह बात सुनी, तब मेरे समझ में आया कि इनके पास भी कोई झूठी खबर पहुँच गई है। मैंने कहा कि (नहीं माजी! ऐसी बात नहीं है) श्री स्वामी जी महाराज ने शरीर नहीं छोड़ा है, मैं वहीं से आया हूँ, वे राजीखुशी हैं। जब उन्होंने यह बात सुनी, तब शोक छोड़ा और सामान्य हुई, नहीं तो वो झूठी बात को ही सच्ची मानकर शोक पालने में लग गई थी। इस प्रकार लोग बिना सोचे-समझे ही झूठी बात फैला देते हैं और दुनियाँ को दुख देनेका काम कर देते हैं। 
    फेसबुक पर भी किसीने एक अखबार की फोटो प्रकाशित करदी, जिसमें गलेके कैंसरकी बात कही गई है। 
    गलेमें कैंसर के भ्रमवाली एक घटना तो मेरे सामनेकी ही है– 
एक बार सभा में लोगोंको मैं श्री स्वामी जी महाराज की रिकॉर्ड- वाणी (प्रवचन) सुना रहा था। प्रवचनकी आवाज कुछ लोगोंको साफ सुनाई नहीं दी। (श्रीस्वामीजी महाराज जब सभामें बोलते थे तो उन प्रवचनोंकी रिकॉर्डिंग होती थी। उस समय गलती के कारण कभी-कभी आवाज साफ रिकॉर्ड नहीं हो पाती थी। वैसे तो साफ आवाजमें उनके बहुत-सारे प्रवचन हैं, पर कुछ प्रवचनोंकी आवाज साफ नहीं है)। इसलिये समाप्ति पर किसीने कहा कि आवाज साफ नहीं थी (कई बातें पकड़में नहीं आई)। 
    उस समय मेरे बोलनेसे पहले ही एक भाई उठकर खड़ा हो गया और लोगोंकी तरफ मुँह करके बोला कि सुनो-सुनो! (फिर वो बोला–) स्वामीजीके गलेमें कैंसर था, इसलिये प्रवचन की आवाज साफ नहीं थी। 
    मैंने आक्रोश में डाँटते हुए उससे पूछा कि आपको क्या पता? तो उसने जवाब दिया कि आप (संत) लोगोंसे ही सुना है?– ऋषिकेशके संतनिवासमें से ही किसीने ऐसा कहा था (मैं उनको जानता नहीं)।} फिर मैंने उनसे कहा कि (श्री स्वामी जी महाराज के) कैंसर नहीं था। मेरे को पता है, मैं उनके साथ में रहा हुआ हूँ। यह सुनकर, उन्होंने सरलतापूर्वक हाथ जोड़ लिये कि मेरेको पता नहीं था। ऐसे, सुनी-सुनाई बात लोग आगे कह देते हैं। 
(फोड़ेका इलाज)
    श्री स्वामी जी महाराज के सिरपर जो फोड़ा हो गया था और लोगोंने जिसको कैंसर कह दिया था, उसको साधारण इलाज से इस प्रकार ठीक किया गया–
    कम्पाउण्डरजीने पट्टी बाँधनेवाला कपड़ा (गोज) मँगवाया और उसके, कैंचीसे छोटे-छोटे कई टुकड़े करवाये। फिर उनको उबाले हुए पानीमें डाल दिया गया। बादमें उनको निकालकर निचौड़ा गया और थोड़ी देरतक उनको हवामें रख दिया गया। उसके बाद फोड़ेको धोकर, उसके ऊपरका भाग (खरूँट) हटा दिया गया। फिर फोड़ेको साफ करके उसपर वे, कपड़ेके टुकड़े रख दिये। उस कपड़ेकी कतरनने फोड़ेके भीतरकी खराबी (दूषित पानी आदि) सोखकर बाहर निकाल ली। फिर वे, कपड़े हटाकर दूसरे कपड़े रखे गये। इस प्रकार, कई बार करनेपर जब अन्दरकी खराबी बाहर आ गयी तब फोड़ेपर दूसरे, स्वच्छ कपड़ेके टुकड़े रखकर उसपर पट्टी बाँधदी गई। 
    शामको जब पट्टी खोली गई तो वे, कपड़ेके टुकड़े भीगे हुए मिले; उन टुकड़ोंने अन्दरकी खराबीको खींचकर सोख लिया था, इसलिये वे भीग गये थे, गीले हो गये थे। 
    तत्पश्चात उन सबको हटाकर सुबह की तरह, फिरसे नई पट्टी बाँधी गई। दूसरे दिन सुबह भी उसी विधिसे पट्टी की गई। ऐसा प्रतिदिन किया जाने लगा। 
    बीच-बीच में यह भी ध्यान गया कि घावका मुँह बन्द न हो। अगर कभी बन्द हो भी जाता तो उसको वापस खोला जाता था जिससे कि दूषित पानी आदि पूरा बाहर आ जाय।
    इस प्रकार सोखते-सोखते कुछ दिनोंके बाद वे, कपड़ेके टुकडे भीगने बन्द हो गये। फोड़ेके भीतरकी खराबी बाहर आ गयी तथा महीनेभर बादमें, वो फोड़ा ठीक हो गया। उस जगह पर साफ, नई चमड़ी आ गई।
    इसके बाद ऐसी ही विधि दूसरे लोगोंके घाव आदिको ठीक करनेके लिये की गई और उनके भी घाव ठीक हुए।
    इससे एक बात यह समझमें आयी कि ऊपरसे दवा लगानेकी अपेक्षा भीतरकी खराबी बाहर निकालना ज्यादा ठीक रहता है।
    डॉक्टर आदि कई लोगोंने ऊपरसे दवा लगा-लगा कर ही इलाज किया था, भीतरसे विकृति निकालनेका, ऐसा उपाय उन्होंने नहीं किया था। तभी तो उनको सफलता नहीं मिली। 
    ऐसे ही, गले के कफ का इलाज भी उन्होंने सुगमतापूर्वक कर दिया–
(कफका इलाज)
    कई बार श्री स्वामी जी महाराज के सर्दी, जुकाम आदि हो जाता था, गलेमें कफ हो जाता था, जिसके कारण सत्संग के समय भी बोलने में दिक्कत आती थी।
    सत्संग सुननेमें बाधा न हो– इसके लिये कभी-कभी श्री स्वामी जी महाराज के गले में गर्म कपड़ेकी पट्टी लपेटी जाती थी और कफ डालनेके लिये दौने आदि में मिट्टी रखी जाती थी; लेकिन उसका इलाज भी कम्पाउण्डरजीने एक साधारण-से उपाय द्वारा कर दिया।
    वे बोले कि स्वामीजी महाराजके सामनेसे यह (कफदानी वाला) बर्तन हटाना है और उसका उपाय यह बताया कि लोटा भर पानीमें एक दो चिमटी (चुटकी) नमक डालकर उबाल लो। जब चौथाई भाग जल रह जाय तब अग्निसे नीचे उतार लो और ठण्डा होनेपर इनको पिलादो।
    उनके कहनेपर ऐसा ही किया गया और कुछ ही दिनोंमें श्री स्वामी जी महाराज का गला ठीक हो गया। गलेका कफ चला गया और कफ डालनेके लिये रखा जानेवाला, मिट्टीका बर्तन भी हट गया। नहीं तो वर्षोंतक यह, कफवाली समस्या बनी रही थी।
    किसीने गलेमें लपेटी हुई उस समय की पट्टी को देखकर कैंसर समझ लिया होगा अथवा, कैंसरवाली गलतफहमीकी पुष्टि की होगी तो वो भी बिना जाने, अज्ञानता के कारण थी। वास्तव में, गलेमें पट्टी कैंसर के कारण नहीं लपेटी जाती थी, गलेवाले कफके कारण लपेटी जाती थी। जब कफ चला गया, तब गला ठीक हो गया। सिरवाला फोड़ा भी ठीक हो गया था। इस प्रकार, श्री स्वामी जी महाराज के न तो कभी गलेमें कैंसर हुआ था और न सिरपर। भगवान् की कृपासे सब ठीक था। 
    लोगोंमें एक (कल्पित)बात यह भी फैली हुई है कि एक डॉक्टर ने (यन्त्र के द्वारा) श्री स्वामी जी महाराज के गलेकी जाँच की, तो उसमें, डॉक्टर को ब्रह्माण्ड दिखायी दे गया। कोई कहते हैं कि डॉक्टर को वहाँ, भगवान् के दर्शन हो गये। 
    ऐसे ही कुछ कल्पित बातें, ये भी फैली हुई हैं– कोई कहते हैं कि श्री स्वामी जी महाराज धर्म के अवतार थे, कोई सञ्जय का और कोई विदुर जी का अवतार बता देते हैं। कोई तो कह देते हैं कि ये स्वयं, श्री जीयाराम जी महाराज ही थे। परन्तु श्री स्वामी जी महाराज ने इन बातों को स्वीकार नहीं किया है। ये लोगोंकी कल्पनाएँ हैं, वास्तविकता नहीं। 
    बीकानेर धोरेपर "भृगुसंहिता" के एक फलादेशका पन्ना लाया गया और श्री स्वामी जी महाराज के सामने ही कुछ लोगोंको सुनाया गया। उस पन्ने में श्री स्वामी जी महाराज के लिये लिखा था कि यह जीव द्वापरयुग के अन्तिम समय का है ... और गीता का प्रचार करेगा। कई लोग इसका प्रमाण देकर श्री स्वामी जी महाराज को "अवतार" बता देते हैं। लेकिन उसमें किसी अवतारी का नाम नहीं लिखा था (कि ये अमुकके अवतार हैं ) और न ही किसी महात्मा का नाम लिखा था (कि ये अमुक महात्मा ही हैं)। लोग बिना सोचे-समझे और सुनी-सुनाई बात बोल देते हैं। इसलिये यह समझना चाहिये कि वास्तव में, बात क्या है। ये महात्मा तो थे; परन्तु कौन महात्मा थे– इस बात का पता नहीं है। बिना जाने इनको किन्हीका अवतार या किसी नामवाले महात्मा बता देना सच्चाई नहीं है। 
    बिना समझे किसीको अवतार मानने में लाभ भी नहीं है। श्री स्वामी जी महाराज भी अवतार न बताने में लाभ मानते हैं। क्योंकि अवतार न मानने से तो कोई हिम्मत भी कर सकता है कि ऐसा मैं भी बन सकता हूँ, ऐसे मैं भी कर सकता हूँ, आदि और अवतार मानने से वैसी हिम्मत नहीं करता – कह, वो तो अवतार थे, इसलिये उन्होंने ऐसा कर लिया, हम थोड़े ही कर सकते हैं। हम अवतार थोड़े ही हैं जो ऐसा कर सकें। हम तो साधारण जीव हैं, आदि आदि। इसलिये हमें ऐसी कल्पनावाली बातों को महत्त्व न देकर स्वयं, उन महापुरुषों द्वारा कही हुई, वास्तविक बातोंको ही महत्त्व देना चाहिये। और उनसे लाभ लेना चाहिये। 
    एक बार की बात है कि श्री स्वामी जी महाराज को 'महासती सावित्री' नामक एक पुस्तक दिखाई गई, जिसमें सावित्री को अवतार के समान बताया गया था। तब श्री स्वामी जी महाराज ने पूछा कि श्री सेठजी ने (संक्षिप्त महाभारत में) क्या लिखा है? महाभारत देखने से पता लगा कि सावित्री को इस प्रकार अवतार नहीं बताया गया है। तब श्री स्वामी जी महाराज ने बताया कि श्री सेठजी के द्वारा बनाये गये ग्रंथों में सच्चाई है। [ऐसी सच्चाई हरेक लेखक की पुस्तक में नहीं मिलती]। फिर श्री स्वामी जी महाराज ने ऐसे महापुरुषों की कृत्ति की महिमा कही और निर्देश दिया कि श्री सेठजी के द्वारा संक्षिप्त किये गये ऐसे, पद्मपुराण आदि कल्याण के विशेषांकों में जो कथाएँ आयी है, उनको अलग से, पुस्तक रूप में छपवायी जायँ। (इससे लोगों का कल्याण होगा)। उसके बाद ऐसी कई पुस्तकें छापी गई, जिनमें प्रमुख हैं– रामाश्वमेध (लवकुश चरित्र), नल-दमयन्ती, सावित्री-सत्यवान आदि। इस प्रकार यह समझाया गया कि बिना जाने किसी महात्मा या सती आदि को अवतार मानना लाभदायक नहीं है। 
    कई लोग बोल देते हैं कि स्वामीजी महाराज पढ़े हुए नहीं थे, लेकिन उनकी यह बात सर्वथा झूठी है। श्री स्वामी जी महाराज तो जोरदार पढ़े हुए थे। वे संस्कृत पाठशाला में विद्यार्थियों को संस्कृत व्याकरण पढ़ाते थे। उन्होंने एक सज्जनको छः महीनों में ही पूरी ‘लघुसिद्धान्तकौमुदी’ पढ़ा दी थी (जबकि अन्य लोगों को लघुसिद्धान्तकौमुदी पढ़ाने में कई वर्ष लग जाते हैं)। हर किसीको कम समय में अधिक पढ़ानेकी युक्ति नहीं आती है। श्री स्वामी जी महाराज को पढ़ाने की और बात समझाने की बहुत बढ़िया युक्ति आती थी। इसके सिवाय उन्होनें छहों शास्त्रों की तथा अद्वैत सिद्धान्तकी, वेदान्त की भी पढ़ाई की और आचार्य तक की परीक्षा भी दी थी। वे तो शास्त्रों से भी ऊपर उठे हुए जीवन्मुक्त महापुरुष थे। ] 
    लोगों को गीता पढ़ाने के लिये श्री स्वामी जी महाराज ने गीता- पाठशाला खोल रखी थी। 
    उन्होंने गीताजी की प्रचण्ड टीका– 'साधक संजीवनी' लिखी है जिसकी बराबरी आज दुनियाँ में कोई भी गीताजी की टीका नहीं कर सकती। ऐसे ही गीता पर शोधपूर्ण ग्रंथ– 'गीता-दर्पण' लिखा है जिसके जोड़का भी दुनियाँ में कोई ग्रंथ नहीं है। अगर श्री स्वामी जी महाराज पढ़े हुए नहीं होते, तो गीताजी की ऐसी अद्वितीय टीका कैसे लिखते?
    जिन दिनों में कल्याण का पद्मपुराणांक निकला था, उस समय पद्मपुराण की हिन्दी टीका मिली नहीं। पद्मपुराण केवल संस्कृत भाषा में ही उपलब्ध हुआ था। तब श्री स्वामी जी महाराज ने श्री सेठ जी को संस्कृत- पद्मपुराण हिन्दी में सुनाया था। स्वामी जी महाराज पद्मपुराण के संस्कृत श्लोकों का हिन्दी में अनुवाद करते और श्री सेठ जी को सुनाते थे। सुनकर श्री सेठ जी (कल्याण के विशेषांक के लिये) संशोधन करते थे कि इतना अंश ले लो, यहाँ से यहाँतक ले लो आदि। अगर श्री स्वामी जी महाराज पढ़े हुए नहीं होते तो संस्कृत को हिन्दी में कैसे सुनाते और पाठशालामें विद्यार्थियोंको संस्कृत व्याकरण कैसे पढ़ाते? ऐसी बातों से सिद्ध होता है कि श्री स्वामी जी महाराज बहुत पढ़े हुए थे। उनकी सरलताके कारण हर किसीको उनकी विद्वत्ताका पता नहीं लगता। 
    लोग बिना जाने ही कल्पित बातें करते रहते हैं। कल्पित बातें न तो महापुरुषोंको पसन्द है और न ही कोई सच्चे आदमी को। महापुरुष तो जानी हुई, यथार्थबातें, सच्ची बातें ही करते हैं तथा लाभ भी सच्ची बातों से ही होता है।
    बहुत से लोग ऐसे हैं जो श्री स्वामी जी महाराज की वास्तविक, सच्ची बातें नहीं जानते। सत्संग करनेवाले लोगों में भी, वास्तविक बातें जाननेवाले कम हैं। वास्तविक बातोंकी आवश्यकता और महत्त्व समझनेवाले लोग बहुत कम हैं।
    कुछ लोग ऐसे भी देखने-सुनने में आये हैं कि श्री स्वामी जी महाराज के विषय में कोई बात, अपने मनसे ही गढ़कर कह देते हैं। कोई सत्यबातमें असत्य मिलाकर कहते हैं। कोई तो श्री स्वामी जी महाराज की प्रशंसा करते हुए भी झूठीबात बोल देते हैं। कोई श्री स्वामी जी महाराज की बात या व्यवहार को लेकर अपनी प्रशंसा में जोड़ देते हैं। कोई अपनी हल्की सोच के अनुसार श्री स्वामी जी महाराज और श्री सेठजी जैसे महापुरुषोंके लिये भी हल्की बात कह देते हैं। ऐसी बात भी कह देते हैं जो उन महापुरुषों के स्वभाव में ही नहीं है। श्री स्वामी जी महाराज ने बताया कि एक माई मेरे लिये बचपन की बात बताती हुई बोली कि स्वामीजी जब भिक्षा लाने के लिये जाते तो (हमारे) यहाँ बोरड़ी (बेरीवृक्ष) के झोली टाँग देते और खेल में लग जाते थे। श्री स्वामी जी महाराज ने कहा कि (झूठी बात है यह, क्योंकि) ऐसे मेरे स्वभाव में ही नहीं है कि मेरे को कोई काम के लिये भेजे और मैं बीच में ही किसी दूसरे काम में लग जाऊँ, खेल में लग जाऊँ। इस प्रकार लोग सोचते नहीं कि उनके लिये यह कैसे सम्भव है। यह तो उनके स्वभाव में ही नहीं है। उनके जीवन की तरफ भी नहीं देखते, उनके रहन- सहन और सिद्धान्तों पर भी विचार नहीं करते। उनका गौरव घटाने का काम कर देते हैं।
    ऐसे महापुरुषोंके लिये, कुछ लोगोंको तो घटिया बात कहने में भी शर्म नहीं आयी। किसीने तो श्री सेठजी के लिये घटिया और झूठी बात पुस्तक में भी लिख दी। किसीने बिल्वमङ्गलकी घटनाको श्री तुलसीदास जी महाराज की घटना बता दिया। ऐसे लोग दूसरेकी घटनाको संतोंकी घटना बता देते हैं, असत्य से भी परहेज नहीं करते।
    एक लेखक तो ऐसा देखने में आया कि श्री स्वामी जी महाराज की बात अपने मन के विरुद्ध लगी या अपने आचरण के खिलाफ लगी तो उस बात को ही हटा दिया और उसकी जगह अपने दूषित मनकी बात लिख दी। इस प्रकार अपना बचाव किया। ऐसे ही कुछ लोग महापुरुषों के काम को भी अनुचित बता देते हैं।
    कोई तो श्री स्वामी जी महाराज का नाम लेकर अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं। ऐसे लोग महापुरुषोंका गौरव घटाते हैं और गलत प्रचार करते हैं। इससे महापुरुषोंकी महिमा छिपती है और दुनियाँकी बड़ी भारी हानि होती है।
 

    वास्तवमें, उनके कैंसर न तो कभी गलेमें हुआ था और न सिरपर। किसी भी अंग में कैंसर नहीं हुआ था। उनके साथमें रहनेवाले, सत्संग करनेवाले, अनेक भाई बहन ऐसे हैं, जो इस बातको जानते हैं तथा मैंने भी, वर्षोंतक श्री स्वामी जी महाराज के पासमें रहकर देखा है और बहुत नजदीक से देखा है कि उम्रभर में, उनके किसी भी अंग में, कैंसर हुआ ही नहीं था। 

      निवेदक-                                           ( डुँगरदास राम )

----------------------------------------------------------------------

    इस प्रकार श्री स्वामी जी महाराज के विषय में जब लोग बिना सोचे-समझे, मनगढ़न्त बातें करने लग गये और वास्तविक, सच्ची बातें मिलनी मुश्किल हो गई, तब यह आवश्यक समझा गया कि श्री स्वामी जी महाराज की कुछ ऐसी बातें यहाँ लिखी जायँ, जो सच्ची हों, वास्तविक हों, प्रामाणिक हों और लोगोंको उन बातों से सही मार्गदर्शन मिल सके। वे ऐसी बातें हो कि जिनके सहारे लोग दूसरी, सही बातोंका निर्णय कर सकें और मनगढ़न्त बातोंका निराकरण करके, प्रामाणिक बातें कह सकें।  
    प्रामाणिक बातें वे हैं कि जिनको स्वयं– श्री स्वामी जी महाराज ने कहा हो; क्योंकि स्वयं की बातें, स्वयं से अधिक और कौन जान सकता है? इसलिये स्वयं श्री स्वामी जी महाराज से सुनी हुई बातों के ही कुछ भाव यहाँ लिखे जा रहे हैं— ... ××× 
— 'महापुरुषोंकी बातें और कहावतें' नामक पुस्तक से।