(श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज के )
(३०) परमधाम गमनकी बातें
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जगन्माता विविधरूपोंमें सबका पालन- पोषण करती है। भगवती श्री सीताजी जगत् की माँ (जगदम्बा) भी हैं और गुरु भी हैं। ये जीवोंका पालन-पोषण भी करती है और ज्ञान भी देती है । ये जीवों को भगवान् का प्रेम (रामस्नेह) सिखाती है और प्रेम प्रदान भी करती है।
श्री स्वामी जी महाराज कहते हैं कि श्री रामस्नेही- सम्प्रदायकी मूल आचार्या जगज्जननी श्री सीताजी हैं।
आपके "दीक्षागुरु" 'श्री श्री कन्हीरामजी महाराज' इसी सम्प्रदाय के संत थे। वे विक्रम संमत १९८६ में, मिगसर बदी तीज, मंगलवार को ब्रह्मलीन हुए। चाखू में उनका समाधि-स्थल है। उसके शिलालेख पर श्री स्वामी जी महाराज ने उनके निर्वाण- दिवस का यह दोहा रचकर के लिखवाया है—
संवत नवससि षडवसु बद मिगसर कुज तीज ।
कन्हीराम तनु त्यागकर भये आपु निर्बीज ॥
'परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराज' विक्रम संवत २०६२ में, आषाढ़ बदी एकादशी की रात्रि और द्वादशीकी सुबह, रविवारको ब्राह्ममुहूर्त के अवसर पर, लगभग ३॥ (साढ़े तीन) बजे के बाद, गंगातट पर ब्रह्मलीन हुए।
तदनुसार इस पुस्तक में यह दोहा लिखा गया–
संवत नभ चख षड नयन रवि आषाढ़ बद भाण ।
स्वामि रामसुखदास जी तनु तजि भए निर्वाण ॥
अन्तिम समयमें आपके पास संतलोग भगवन्नामका कीर्तन कर रहे थे। अन्तिम समय की हलचलमें जब आपको गंगाजल दिया गया, तब आपने अन्तिम श्वासोंके बीच में, प्राणान्त- कष्टकी परवाह न करते हुए गंगाजलका आदरपूर्वक घूँट लिया और स्थिर होकर, कोशिश करके उसको निगला भी। फिर उसी समय आपने शरीर त्यागकर भगवद्धाम प्राप्त किया। (गीता साधक-संजीवनी ८।५, ६ और २५ वें श्लोकोंकी व्याख्या के अनुसार भगवद्धाम को प्राप्त हुए)।
प्रश्न– सुना है कि उनकी चिता- भस्म को गंगाजी समेट कर ले गई?
उत्तर– जी हाँ, उनकी अन्तिम क्रिया गंगाजी के किनारे (गंगाजल से लगभग पाँच-दस फुट की दूरी पर) की गई थी। ( उनसे सम्बन्धित कम्बल आदि वस्तुओं को भी गंगातट पर अग्नि को समर्पित कर दिया गया जिससे कि उन वस्तुओंका दुरुपयोग न हो। अधिक जानकारी के लिये 'एक संतकी वसीयत' नामक पुस्तक पढ़ें। सन्ध्या-पूजा आदि और अन्य सामग्री गंगाजी में प्रवाहित कर दी गई।) दाहक्रिया के बाद दूसरे तीसरे दिन ही गंगाजी इतनी बढ़ी कि वहाँ के चिताभस्म आदि सब अवशेष बहाकर अपने साथ में ले गई। वहाँ की धरती ही बदल गई। भारी मात्रा में वहाँ गंगाजी की बालुका बिछ गई, गंगा किनारे गंगारज का पठार बन गया। पहलेवाला दृश्य लुप्त हो गया। मानो गंगाजी भी ऐसे अवसर को पाना चाहती थी। महापुरुषों के संग से गंगाजी भी पवित्र होती है।
श्रीमद्भागवत में लिखा है कि राजा भगीरथ ने माता गंगा जी से मर्त्यलोक में चलने की प्रार्थना की। उस समय श्री गंगा जी बोली कि ... लोग मुझ में अपने पाप धोयेंगे। फिर मैं उस पाप को कहाँ धोऊँगी। भगीरथ! इस विषय में तुम स्वयं विचार करलो॥५॥
[इसपर राजा भगीरथ बोले कि संत- महात्माओंके संगसे आपके पाप नष्ट हो जायेंगे–]
भगीरथ उवाच
साधवो न्यासिनः शान्ता ब्रह्मिष्ठा लोकपावनाः।
हरन्त्यघं तेऽङ्गसङ्गात् तेष्वास्ते ह्यघभिद्धरिः ॥
भगीरथने कहा – 'माता ! जिन्होंने लोक-परलोक, धन-सम्पत्ति और स्त्री-पुत्रकी कामनाका संन्यास कर दिया है, जो संसारसे उपरत होकर अपने-आपमें शान्त हैं, जो ब्रह्मनिष्ठ और लोकोंको पवित्र करनेवाले परोपकारी सज्जन हैं— वे अपने अंगस्पर्शसे तुम्हारे पापोंको नष्ट कर देंगे। क्योंकि उनके हृदयमें अघरूप अघासुरको मारनेवाले भगवान् सर्वदा निवास करते हैं॥६॥ (श्रीमद्भागवत ९।९।५,६;)।
महापुरुषों के प्रस्थान कर जाने पर प्रकृति ने भी अपने नियम बदल दिये— दो वर्षों तक वहाँ आम के पेड़ों के फल लगने बन्द हो गये। (सुना है कि अनेक लोगों ने इस घटना को देखा है और ऐसा कहा है)। हर साल उन पेड़ों के इतने आम्रफल लगते थे कि बिक्री आदि के लिये आम ठेके पर दिये जाते थे; परन्तु उस साल वैसे लगे ही नहीं। मानो महापुरुषों के वियोग का दुख पेड़- पौधों को भी हुआ, वे इसको सह नहीं सके। गोस्वामी जी श्री तुलसीदास जी महाराज ने कहा है–
बंदउँ संत असज्जन चरना । दुखप्रद उभय बीच कछु बरना ॥
बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं । मिलत एक दुख दारुन देहीं ॥
(रामचरितमानस १|५|३,४:)।
अब श्री स्वामी जी महाराज इस दुनियाँ में अपनी वाणी के रूप में विराजमान हैं।
श्री स्वामी जी महाराज की एक यह विशेष कृपा है जो उन्होंने हमलोगों को अपनी साधारण बोली (गद्य) में ज्ञान दिया। अगर कविता आदि विशेष बोली (पद्य) में देते तो हमारेको ठीक तरह से समझ में आता या नहीं– इसका पता नहीं; पर साधारण भाषा में दिया है, इसलिये हमारे सुगमता से समझ में आ जाता है।
जैसे, आजकल अनेक संतों की वाणी पद्य में उपलब्ध है; पर हम उसको ठीक तरह से समझ नहीं पाते और श्री स्वामी जी महाराज की वाणी गद्य में है, इसलिये हम उसको सुगमता से समझ लेते हैं। इस में भी श्री स्वामी जी महाराज की एक विशेष कृपा और है। वो यह कि ‘सरलतापूर्वक लोगोंके बात समझ में आ जाय’– ऐसा उन्होंने विशेष ख्याल रखा है और प्रयत्न किया है। आपकी लिखित और रिकॉर्डिंग वाणी अधिकतर हिन्दी भाषा में है।
संतलोग पद्य आदि में अपने अनुभव की वाणी लिखा करते हैं। यह संतोंकी रीति रही है। श्री स्वामी जी महाराज ने भी गद्य और पद्य– दोनों में अपनी वाणी लिखी है। गद्यवाली वाणी तो आपकी बहुत विशाल है (गद्यरूप में लेख और प्रवचनों की अनेक पुस्तकें हैं)। पद्यवाली वाणी (रचनाएँ) कुछ इस प्रकार है– ...
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— 'महापुरुषोंकी बातें और कहावतें' नामक पुस्तक से।
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