मंगलवार, 1 अप्रैल 2014

वोट किसको दें?।

वोट किसको दें?
सन् 1993 में 3 अक्टूबर रात्रि 8 बजे 'श्रध्देय स्वामीजी रामसुखदासजी महाराज'ने जोधपुरमें बड़े जोरसे कहा है कि जो गऊओंकी रक्षा करे,राममन्दिर और हिन्दुओंके हितका वादा करे;
वोट उसीको दें।
वो प्रवचन सुननेके लिये इस पते(लिंक) पर जायें-

https://drive.google.com/file/d/0B1hTIYwow9O-d1FRYmRfYjFWV28/edit?usp=docslist_api

मंगलवार, 25 मार्च 2014

सूवा-सूतकमें भगवानकी पूजा करें अथवा नहीं? श्रध्देय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजने बताया है कि करें (बिना प्राण-प्रतिष्ठावाली मूर्तिकी करें)।

                                 ।।  श्री हरि:।।
सूवा-सूतकमें भगवानकी पूजा करें अथवा नहीं? श्रध्देय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजने बताया है कि करें (बिना प्राण-प्रतिष्ठावाली मूर्तिकी करें)।
(एक सज्जनने लिखा है कि-)
प्रश्न - जन्मके आशौच या मरणके आशौच में भोजन करने से पहले भगवान् के अर्पण करें अथवा नहीं? - सीताराम ।
उत्तर-
(अपने भगवानके अर्पण करें। )
श्रध्देय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजने बताया है कि
भगवानकी जिस मूर्तिकी प्राण-प्रतिष्ठा करवाई गई है,
(वो मूर्ति प्राणधारी है ,इसलिये )उस मूर्तिकी तो जैसे एक प्राणधारी मनुष्यकी सेवा होती है,वैसे ही भगवानकी उस मूर्तिकी भी  सेवा होनी चाहिये (उनके भोजन,वस्त्र,ठण्डी गर्मी,आराम आदिका ध्यान रखना चाहिये)।
सूवा-सूतकमें भगवानकी उस मूर्तिकी सेवा-पूजा तो ब्राह्मण आदिसे करवावें;अथवा ब्याही हुई कन्या(बेटी) हो तो उससे करवावें; 
परन्तु जिस मूर्तिकी प्राण-प्रतिष्ठा नहीं करवाई गई है , वे ठाकुरजी तो  अपने घरके सदस्यकी तरह हैं।उन अपने भगवानके सूवा-सूतक हमारे साथमें ही लगते हैं और हमारे  साथमें ही उतरते हैं। (इसलिये सूवा-सूतकमें भी भगवानकी पूजा-अर्चा न छोड़ें,जैसे हम स्नान,भोजन आदि सूवा-सूतकमें भी नहीं  छोड़ते;करते हैं;ऐसे ही भगवानके भी करने  चाहिये)-डुँगरदास राम।
सीताराम सीताराम ।

सोमवार, 24 मार्च 2014

वर्णसंकरका विषय

वर्णसंकरके विषयमें 'साधक-संजीवनी (लेखक- श्रध्देय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराज) गीता'के इन श्लोकोंकी व्याख्या पढनेका परिश्रम करावें-1/41'42: 3/24; ।
पापमुक्तिकी बात 18/66 में देखें और भक्तकी बात 4/3;18/58,59 में देखें।
सीताराम

शनिवार, 1 मार्च 2014

सत्संग - स्वामी रामसुखदासजी महाराज

  ।।श्री हरि:।।
सत्संग-संतवाणी

श्रध्देय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी  महाराजका सत्संग ( SATSANG GITA AADI -S.S.S.RAMSUKHDASJI MAHARAJ ) और गीता-पाठ, गीता-गान(सामूहिक आवृत्ति,साफ आवाज वाली  रिकार्डिंग ), गीता-माधुर्य(उन्हीकी आवाजमें), गीता-व्याख्या(करीब पैंतीस कैसेटोंका सेट), 'कल्याणके तीन सुगम मार्ग'[नामक पुस्तककी उन्हीके द्वारा व्याख्या], नानीबाईका माहेरा, भजन, कीर्तन, पाँच श्लोक(गीता ४/६-१०), तथा नित्य-स्तुति, गीता, सत्संग(-श्रध्देय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराजके 71 दिनोंका सत्संग-प्रवचनोंका सेट), मानसमें नाम-वन्दना, राम-कथामें सत्संग आदि तथा इनके सिवाय और भी सामग्री आप यहाँ(के इन पते-ठिकानों ) से मुफ्तमें-निशुल्क प्राप्त करें- 

(1-) http://db.tt/v4XtLpAr

(2-) http://www.swamiramsukhdasji.org 

(3-) http://goo.gl/28CUxw 

नोट- यहाँ पर श्रध्देय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजकी पढने योग्य साधक-संजीवनी, साधन-सुधा-सिन्धु, गीता-दर्पण आदि करीब तीस पुस्तकें भी नि:शुल्क उपलब्ध है|

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पता-सत्संग-संतवाणी. श्रध्देय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका साहित्य पढें और उनकी वाणी सुनें। http://dungrdasram.blogspot.com/

शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2014

आश्चर्ययुक्त भगवानकी चेष्टा।

(श्री मद्भागवत-)

अहो विचित्रं भगवद्विचेष्टितं
घ्नन्तं जनोऽयं हि मिषन्न पश्यति ।
ध्यायन्नसद्यर्हि विकर्म सेवितुं
निर्हृत्य पुत्रं पितरं जिजीविषति ॥ ५-१८-३ ॥

वदन्ति विश्वं कवयः स्म नश्वरं
पश्यन्ति चाध्यात्मविदो विपश्चितः ।
तथापि मुह्यन्ति तवाज मायया
सुविस्मितं कृत्यमजं नतोऽस्मि तम् ॥ ५-१८-४ ॥

सोमवार, 20 जनवरी 2014

÷सूक्ति-प्रकाश÷(श्रध्देय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजके श्रीमुखसे सुनी हुई कहावतें आदि). सूक्ति-संख्या ७०-८०  तक.

                                              ||श्री हरिः||

                                        ÷सूक्ति-प्रकाश÷

(श्रध्देय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजके श्रीमुखसे सुनी हुई कहावतें आदि).
सूक्ति-संख्या ७०-८०  तक.

सूक्ति-७१.
पाणी पीजै छाणियो,गुरु कीजै जाणियो.
शब्दार्थ-
जाणियो(जाना-पहचाना हुआ ).

सूक्ति-७२.
गुरु लोभी सिख लालची दौनों खेले दाँव |
दौनों डूबा परसराम बैठि पथरकी नाव ||
- ÷ -
.आँधे केरी डाँगड़ी आँधे झेली आय |
दौनों डूबा … ?… …काळकूपके माँय ||

सूक्ति-७३.
जाणकारको जायकै मारग पूछ्यो नाँय |
जन 'हरिया' जाण्याँ बिना आँधा ऊजड़ जाय ||
शब्दार्थ-
ऊजड़ (बिना रास्ते,जंगलमें ).

सूक्ति-७४.
कह,गुरुजी ! बिल्ली आगी (घरमें ).
कह, आडो बन्द* करदे .
शब्दार्थ-
आडो बन्द करदे ( किंवाड़ बन्द करदे - यहाँ तो कुछ मिलेगा नहीं और दूसरी जगह जा सकेगी नहीं;)

*आजकल भी जो आकर चेला बन जाते हैं ,उनको गुरुजी आज्ञा दे-देते हैं कि दूसरी जगह सुनने मत जाना,तो उस शिष्यकी भी दशा उस बिल्लीकी तरह होती है  कि वहाँ तो कुछ (परमात्म-तत्त्व )मिलता नहीं और दूसरी जगह जा सकते नहीं |

सूक्ति-७५.
आकोळाई ढाकोळाई,पाँचूँ रूंखाँ एक तळाई.
दै रे चेला धौक, कह रुपयो धरदे रोक.

सूक्ति-७६.
कान्यो-मान्यो कुर्र्र्र्र्  , कह तूँ चेलो अर हूँ (मैं) गुर्र्र्र्र .
शब्दार्थ-
हूँ (मैं,स्वयं ).

सूक्ति-७७.
(कोई) मिलै हमारा देसी,गुरुगमरी बाताँ केहसी .
शब्दार्थ-
केहसी (कहेगा ).

सूक्ति-७८.
कह,मिल्यो कोनि कोई काकीरो जायो .

सूक्ति-७९.
कह,ओ तो म्हारे खुणींरो हाड है .
शब्दार्थ-
खुणीं (कोहनी,कोहनीकी हड्डी मजबूत,बड़े कामकी और प्रिय होती है ; अपने भाई आदि नजदीक-सम्बन्धीके लिये कहा जाता है कि 'यह तो मेरे कोहनीकी हड्डी है').

सूक्ति-८०.
कह, किणरी माँ सूंठ खाई है ! .
(सूंठ खानेवाली माँ का दूध तेज होता है; ऐसे ही धनियाँके लड्डू खानेवाली माँ के दूध बढ जाता है और जिस मनुष्यके गला बड़ा होता है,कोई चीज आसानीसे निगल ली जाती है , तो उसकी माँके दूध ज्यादा , पर्याप्त आता था (यह पहचान मानी जातीहै ).|

रविवार, 19 जनवरी 2014

÷सूक्ति-प्रकाश÷ (श्रध्देय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजके श्रीमुखसे सुनी हुई कहावतें आदि). सूक्ति-संख्या ६१-७० तक.

                                              ||श्री हरिः||

                                        ÷सूक्ति-प्रकाश÷

(श्रध्देय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजके श्रीमुखसे सुनी हुई कहावतें आदि). सूक्ति-संख्या ६१-७० तक.

सूक्ति-६१.
तनकी भूख इतनी बड़ी आध सेर या सेर |
मनकी भूख इतनी बड़ी निगल जाय गिरि मेर ||
शब्दार्थ-
निगल जाय (गिट जाय,मुखमें समालेना, बिना चबाये पेटमें लै जाना ).गिरि मेर (सुमेरु पर्वत ).

सूक्ति-६२.
मृग मच्छी सज्जन पुरुष रत तृन जल संतोष |
ब्याधरु धीवर पिसुनजन करहिं अकारन रोष ||
शब्दार्थ-
रत (लगे रहते हैं ) ब्याध (मृग मारनेवाला,शिकारी ).धीवर (मच्छली पकड़नेवाला ).पिसुनजन (चुगली करनेवाले,निन्दा करनेवाले ).

सूक्ति-६३.
जो जाके शरणै बसै ताकी ता कहँ लाज |
उलटे जल मछली चढै बह्यो जात गजराज ||
शब्दार्थ-
उलटे जल… (ऊपरसे परनाल आदिकी गिरती हुई धाराके सामने चढ जाना,उसीके सहारे ऊपर चढ जाना ).

सूक्ति-६४.
…[माया] गाडी जिकी गमाणी |
बीस करोड़ बीसळदेवाळी पड़गी ऊँडे पाणी ||
खावो खर्चो भलपण खाटो सुकरित ह्वै तो हाथै |
दियाँ बिना न जातो दीठो सोनो रूपो साथै ||
कथा-
अजमेरके राजाजीके भाईका नाम बीसळदेव था | दौनों भाई परोपकारी थे | राजाजी रोजाना एक आनेकी सरोवरसे मिट्टी बाहर निकलवाते थे (सरोवर खुदानेका,उसमें पड़ी मिट्टी बाहर निकालनेका बड़ा पुण्य होता है ).ऐसे रोजाना खुदाते-खुदाते वो 'आनासागर'(बड़ा भारी तालाब) बन गया,जो अभी तक भी है | बीसळदेवजीने विचार किया कि मैं तो एक साथ ही  बड़ा भारी दान, पुण्य करुँगा (एक-एक आना कितनीक चीज है ) और धन-संचय करने लगे | करते-करते बीस करोड़से ज्यादा हो गया;किसी महात्माने उनको एक ऐसी जड़ी-बूंटी दी थी कि उसको साथमें लेकर कोई पानीमें भी चलै तो पानी उसे रास्ता दे-देता था;उस जड़ीकी सहायतासे बीसळदेवजीने वो बीस करोड़वाला धन गहरे पानीमें लै जाकर सुरक्षित रखा | संयोगवश उनकी रानी मर गई; तब दूसरा विवाह किया (कुछ खर्चा उसमें हो गया ); जब दूसरी रानी आई तो उसने देखा कि राजा पहलेवाली रानीके पसलीवाली हड्डीकी पूजा कर रहे हैं (वो जड़ी ही पसलीकी हड्डी जैसी मालुम पड़ रही थी ) ; रानीने सोचा कि पहलेवाली रानीमें राजाका मोह रह गया | इसलिये जब तक यह हड्डी रहेगी,तब तक राजाका प्रेम मेरेमें नहीं होगा ; ऐसा सोचकर रानीने उस हड्डीके समान दीखनेवाली बूंटीको पीसकर उड़ा दिया | राजाने पूछा कि यहाँ मेरी बूंटी थी न ! क्या हुआ ? तब रानी बोली कि वो बूंटी थी क्या ? मैंने तो उसको पीसकर उड़ा दिया | अब राजा क्या करे , उस बूंटीकी सहायताके बिना वो उस गहरे पानीके अन्दर जा नहीं सकते थे; इसलिये बीस करोड़की सम्पति उस गहरे पानीमें ही रह गयी ; इसलिये कहा गया कि माया को जो यह गाड़ना है वह उसको गमाना ही है-
…गाडी जिकी गमाणी |
बीस करोड़ बीसळदेवाळी पड़गी ऊँडे पाणी ||

सूक्ति-६५.
खावो खर्चो भलपण खाटो सुकरित ह्वै तो हाथै |
दियाँ बिना न जातो दीठो सोनो रूपो साथै ||

सूक्ति-६६.
खादो सोई ऊबर्यो दीधो सोई साथ |
'जसवँत' धर पौढाणियाँ माल बिराणै हाथ ||
शब्दार्थ-
खादो (जो खा लिया ).ऊबर्यो (उबर गया,बच गया ).दीधो (जो दै दिया ).
कथा-
एक राजाने सोचा कि मेरे इतने प्रेमी लोग है,इतनी धन-माया है ; अगर मैं मर गया तो पीछे क्या होगा ? यह देखनेके लिये राजाने [विद्याके प्रभावसे] श्वासकी गति रोकली और निश्चेष्ट हो गये ; लोगोंने समझा कि राजा मर गये और उन्होने राजाको जलानेसे पहले धन-मायाकी व्यवस्था करली,कीमती गहन खोल लिये,कपड़े उतार लिये,एक सोनेका धागा गलेमेंसे निकालना बाकी रह गया था,तो उसको तोड़ डालनेके लिये पकड़कर खींचा,तो वो धागा चमड़ीको काटता हुआ गर्दनमें धँस गया गया,तो भी राजा चुप रहे; फिर पूछा गया कि कोई चीज बाकी तो नहीं रह गयी ? इतनेमें दिखायी पड़ा कि राजाके दाँतोंमें कीमती नग (हीरे आदि) जड़े हुए हैं और वो निकालने बाकी है,औजारसे निकाल लेना चाहिये; कोई बोला कि अब मृत शरीरमें पीड़ा थोड़े ही होती है,पत्थरसे तोड़कर निकाल लो ; राजाकी डोरा (सोनेका धागा ) तोड़नेके प्रयासमें कुछ गर्दन तो कट ही गयी थी ,अब राजाने देखा कि दाँत भी टूटनेवाले है; तब राजाने श्वास लेना शुरु कर दिया; लोगोंने देखा कि राजाके तो श्वास चल रहे हैं,हमने तो इनको मरा मान कर क्या-क्या कर दिया ; कह, घणी खमा, घणी खमा (क्षमा कीजिये,बहुत क्षमा कीजिये). | अब राजा देख चूके थे कि मेरे प्रेमी कैसे हैं और क्या करते हैं तथा धनकी क्या गति होती है | उन्होने आदेश और उपदेश दिया कि धन संग्रह मत करो, काममें लो और दूसरोंकी भलाई करो; दान,पुण्य आदि करना हो तो स्वयं अपने हाथसे करलो (तो अपना है); नहीं तो बिना दिये ये सोना,चाँदी आदि  मरनेपर साथमें नहीं जाते;ऐसा नहीं देखा गया है कि बिना दिये सोना चाँदी साथमें चले गये हों ; इसलिये कहा गया कि - खादो सोई …माल बिराणै हाथ || (कोई कहते हैं कि ये जसवँतसिंहजी जोधपुर नरेश स्वयं थे,जो कवि भी थे )|

सूक्ति-६७.
दीया जगमें चानणा दिया करो सब कोय |
घरमें धरा न पाइये जौ कर दिया न होय ||
शब्दार्थ-
दीया (दीपक,दिया हुआ,दान).कर दिया न…(हाथसे दिया न हो,हाथमें दीपक न हो… तो घरमें रखी हुई चीज भी नहीं मिलती,न यहाँ मिलती है, न परलोकमें मिलती है ).

सूक्ति-६८.
माँगन गये सो मर चुके(मर गये) मरै सो माँगन जाय |
उनसे पहले वो मरे जो होताँ [थकाँ] ही नट जाय ,
उनसे पहल वो मरे होत करत जे नाहिं ||

सूक्ति-६९.
आँधे आगे रोवो, अर नैण गमाओ .

सूक्ति-७०.
जठे पड़े मूसळ ,बठे ही खेम कुसळ.