शनिवार, 18 अक्टूबर 2025

श्री स्वामी जी महाराज के अन्तिम समयकी बातें—

श्री स्वामी जी महाराज के अन्तिम समयकी बातें—  
(श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज के )
(३०) परमधाम गमनकी बातें
× × ×
    जगन्माता विविधरूपोंमें सबका पालन- पोषण करती है। भगवती श्री सीताजी जगत् की माँ (जगदम्बा) भी हैं और गुरु भी हैं। ये जीवोंका पालन-पोषण भी करती है और ज्ञान भी देती है । ये जीवों को भगवान् का प्रेम (रामस्नेह) सिखाती है और प्रेम प्रदान भी करती है।
    श्री स्वामी जी महाराज कहते हैं कि श्री रामस्नेही- सम्प्रदायकी मूल आचार्या जगज्जननी श्री सीताजी हैं।
    आपके "दीक्षागुरु" 'श्री श्री कन्हीरामजी महाराज' इसी सम्प्रदाय के संत थे। वे विक्रम संमत १९८६ में, मिगसर बदी तीज, मंगलवार को ब्रह्मलीन हुए। चाखू में उनका समाधि-स्थल है। उसके शिलालेख पर श्री स्वामी जी महाराज ने उनके निर्वाण- दिवस का यह दोहा रचकर के लिखवाया है—
संवत नवससि षडवसु बद मिगसर कुज तीज ।
कन्हीराम तनु त्यागकर भये आपु निर्बीज ॥
    'परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराज' विक्रम संवत २०६२ में, आषाढ़ बदी एकादशी की रात्रि और द्वादशीकी सुबह, रविवारको ब्राह्ममुहूर्त के अवसर पर, लगभग ३॥ (साढ़े तीन) बजे के बाद, गंगातट पर ब्रह्मलीन हुए।
तदनुसार इस पुस्तक में यह दोहा लिखा गया–
संवत नभ चख षड नयन रवि आषाढ़ बद भाण ।
स्वामि रामसुखदास जी तनु तजि भए निर्वाण ॥
    अन्तिम समयमें आपके पास संतलोग भगवन्नामका कीर्तन कर रहे थे। अन्तिम समय की हलचलमें जब आपको गंगाजल दिया गया, तब आपने अन्तिम श्वासोंके बीच में, प्राणान्त- कष्टकी परवाह न करते हुए गंगाजलका आदरपूर्वक घूँट लिया और स्थिर होकर, कोशिश करके उसको निगला भी। फिर उसी समय आपने शरीर त्यागकर भगवद्धाम प्राप्त किया। (गीता साधक-संजीवनी ८।५, ६ और २५ वें श्लोकोंकी व्याख्या के अनुसार भगवद्धाम को प्राप्त हुए)।
 प्रश्न– सुना है कि उनकी चिता- भस्म को गंगाजी समेट कर ले गई?
 उत्तर– जी हाँ, उनकी अन्तिम क्रिया गंगाजी के किनारे (गंगाजल से लगभग पाँच-दस फुट की दूरी पर) की गई थी। ( उनसे सम्बन्धित कम्बल आदि वस्तुओं को भी गंगातट पर अग्नि को समर्पित कर दिया गया जिससे कि उन वस्तुओंका दुरुपयोग न हो। अधिक जानकारी के लिये 'एक संतकी वसीयत' नामक पुस्तक पढ़ें। सन्ध्या-पूजा आदि और अन्य सामग्री गंगाजी में प्रवाहित कर दी गई।) दाहक्रिया के बाद दूसरे तीसरे दिन ही गंगाजी इतनी बढ़ी कि वहाँ के चिताभस्म आदि सब अवशेष बहाकर अपने साथ में ले गई। वहाँ की धरती ही बदल गई। भारी मात्रा में वहाँ गंगाजी की बालुका बिछ गई, गंगा किनारे गंगारज का पठार बन गया। पहलेवाला दृश्य लुप्त हो गया। मानो गंगाजी भी ऐसे अवसर को पाना चाहती थी। महापुरुषों के संग से गंगाजी भी पवित्र होती है।
    श्रीमद्भागवत में लिखा है कि राजा भगीरथ ने माता गंगा जी से मर्त्यलोक में चलने की प्रार्थना की। उस समय श्री गंगा जी बोली कि ... लोग मुझ में अपने पाप धोयेंगे। फिर मैं उस पाप को कहाँ धोऊँगी। भगीरथ! इस विषय में तुम स्वयं विचार करलो॥५॥
[इसपर राजा भगीरथ बोले कि संत- महात्माओंके संगसे आपके पाप नष्ट हो जायेंगे–]
भगीरथ उवाच
साधवो न्यासिनः शान्ता ब्रह्मिष्ठा लोकपावनाः।
हरन्त्यघं तेऽङ्गसङ्गात् तेष्वास्ते ह्यघभिद्धरिः ॥
    भगीरथने कहा – 'माता ! जिन्होंने लोक-परलोक, धन-सम्पत्ति और स्त्री-पुत्रकी कामनाका संन्यास कर दिया है, जो संसारसे उपरत होकर अपने-आपमें शान्त हैं, जो ब्रह्मनिष्ठ और लोकोंको पवित्र करनेवाले परोपकारी सज्जन हैं— वे अपने अंगस्पर्शसे तुम्हारे पापोंको नष्ट कर देंगे। क्योंकि उनके हृदयमें अघरूप अघासुरको मारनेवाले भगवान् सर्वदा निवास करते हैं॥६॥ (श्रीमद्भागवत ९।९।५,६;)।
    महापुरुषों के प्रस्थान कर जाने पर प्रकृति ने भी अपने नियम बदल दिये— दो वर्षों तक वहाँ आम के पेड़ों के फल लगने बन्द हो गये। (सुना है कि अनेक लोगों ने इस घटना को देखा है और ऐसा कहा है)। हर साल उन पेड़ों के इतने आम्रफल लगते थे कि बिक्री आदि के लिये आम ठेके पर दिये जाते थे; परन्तु उस साल वैसे लगे ही नहीं। मानो महापुरुषों के वियोग का दुख पेड़- पौधों को भी हुआ, वे इसको सह नहीं सके। गोस्वामी जी श्री तुलसीदास जी महाराज ने कहा है–
बंदउँ संत असज्जन चरना । दुखप्रद उभय बीच कछु बरना ॥
बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं । मिलत एक दुख दारुन देहीं ॥
                                                                            (रामचरितमानस १|५|३,४:)।
    अब श्री स्वामी जी महाराज इस दुनियाँ में अपनी वाणी के रूप में विराजमान हैं।
 श्री स्वामी जी महाराज की एक यह विशेष कृपा है जो उन्होंने हमलोगों को अपनी साधारण बोली (गद्य) में ज्ञान दिया। अगर कविता आदि विशेष बोली (पद्य) में देते तो हमारेको ठीक तरह से समझ में आता या नहीं– इसका पता नहीं; पर साधारण भाषा में दिया है, इसलिये हमारे सुगमता से समझ में आ जाता है।
    जैसे, आजकल अनेक संतों की वाणी पद्य में उपलब्ध है; पर हम उसको ठीक तरह से समझ नहीं पाते और श्री स्वामी जी महाराज की वाणी गद्य में है, इसलिये हम उसको सुगमता से समझ लेते हैं। इस में भी श्री स्वामी जी महाराज की एक विशेष कृपा और है। वो यह कि ‘सरलतापूर्वक लोगोंके बात समझ में आ जाय’– ऐसा उन्होंने विशेष ख्याल रखा है और प्रयत्न किया है। आपकी लिखित और रिकॉर्डिंग वाणी अधिकतर हिन्दी भाषा में है।
    संतलोग पद्य आदि में अपने अनुभव की वाणी लिखा करते हैं। यह संतोंकी रीति रही है। श्री स्वामी जी महाराज ने भी गद्य और पद्य– दोनों में अपनी वाणी लिखी है। गद्यवाली वाणी तो आपकी बहुत विशाल है (गद्यरूप में लेख और प्रवचनों की अनेक पुस्तकें हैं)। पद्यवाली वाणी (रचनाएँ) कुछ इस प्रकार है– ... 
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 — 'महापुरुषोंकी बातें और कहावतें' नामक पुस्तक से। 

श्री स्वामी जी महाराज के कैंसर नहीं था।

श्री स्वामी जी महाराज के कैंसर नहीं था। 
आजकल कई लोगों में एक झूठी बात फेल रही है कि श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज के गले में कैंसर था। परन्तु सच्चीबात यह है कि उनके कभी कैंसर हुआ ही नहीं था, कैंसर था ही नहीं। इस बात को ठीक तरह से समझने के लिये कृपया यह लेख पढ़ें— 
(यह लेख 'महापुरुषोंकी बातें और कहावतें' नामक पुस्तक से लिया गया है।) 

(२२) मनगढ़न्त, भ्रामक- बातोंका निराकरण
    भगवान् की, भगवान् के भक्तोंकी, संतोंकी बातें सबके लिये आनन्द मंगल करनेवाली होती हैं। इनसे बड़ा भारी लाभ होता है। इसलिये संतोंकी, भक्तोंकी बातें करनी चाहिये, उनकी कथा कहनी चाहिये और सुननी चाहिये। संत-महात्माओं के विषय में कही जानेवाली बातें सही- सही, यथार्थ होनी चाहिये। अपने मन से ही गढ़कर बातें नहीं कहनी चाहिये। 
    आजकल लोगों में कई मनगढ़न्त, भ्रमकी बातें फैल गई हैं। उनका निराकरण करके, वास्तविक बातें कहनी चाहिये और उनका प्रचार करना चाहिये। 
    'श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराज' के विषयमें, कई लोग मनगढ़न्त बातें करने लग गये हैं। जो बातें कभी हुई ही नहीं, जो बातें कल्पित हैं, झूठी हैं, जिनका कोई प्रमाण ही नहीं है– ऐसी, सुनी-सुनायी बातें लोग आगे कहने लग गये। विचार ही नहीं करते कि सही बात क्या है, उचित बात क्या है?। सच्चीबात का पता ही नहीं लगाते। 
    जैसे, आजकल लोगोंमें यह बात फैली हुई है कि श्री स्वामी जी महाराज के गलेमें कैंसर था। 
    इसके जवाबमें, निश्चयपूर्वक ‘यह’ निवेदन है कि उनके कैंसर नहीं था। उनके उम्रभरमें, कभी कैंसर हुआ ही नहीं था। लेकिन लोग बिना विचारे ही इस बात को कहते सुनते रहते हैं और यह बात चलती ही जा रही है। 
    ऐसी बात स्वयं, श्रीस्वामीजी महाराजके सामने भी आई थी। श्रीस्वामीजी महाराज हँसते हुए बोले कि एक जगह सत्संग का प्रोग्राम होनेवाला था और वो किसी कारणसे नहीं हो पाया। तब किसीने पूछा कि स्वामीजी आये नहीं? उनके आनेका प्रोग्राम था न?  तब किसीने जवाब दिया कि वो तो कैंसल (निरस्त) हो गया। तो सुननेवाला बोला कि अच्छा! कैंसर हो गया क्या? कैंसर हो गया तब कैसे आते? (उसने कैंसल की जगह कैंसर सुन लिया था)। 
    ऐसे लोग बिना विचारे ही, बिना हुई बातको ले दौड़ते हैं। जो घटना कभी घटी ही नहीं, जो व्यवहार कभी हुआ ही नहीं, ऐसी बातों को लोग कहते-सुनते रहते हैं और वे बातें आगे चलती भी रहती है। सही बातका पता लगानेवाले और कहने-सुनने वाले लोग बहुत कम होते हैं। 
    श्रीस्वामीजी महाराजके सिरपर एक फोड़ा हो गया था और उसका इलाज नहीं हो पा रहा था। उन दिनोंमें लोगोंने, उसको भी कैंसर कह दिया था; परन्तु कैंसर वो था नहीं; क्योंकि एक कम्पाउण्डरने उसको साधारण इलाजसे ही ठीक कर दिया था (वो इलाज आगे लिखा गया है)। अगर कैंसर होता, तो वो साधारण-से इलाजसे ठीक कैसे हो जाता? परन्तु बिना सोचे-समझे ही लोग कुछका कुछ कह देते हैं। अपनेको तो चाहिये कि जो बात सच्ची हो, प्रामाणिक हो, उसीको मानें।
    लोगोंने तो ऐसी झूठी खबर भी फैलादी कि श्री स्वामी जी महाराज ने शरीर छोड़ दिया। ऐसे एक बार* ही नहीं, अनेक बार हुआ है। 

*   एक बार की बात है कि मैं अपने गाँव जाकर आया था और श्री स्वामी जी महाराज को वहाँकी बातें सुना रहा था। श्री स्वामी जी महाराज बोले कि वहाँ और कोई नई बात हुई क्या? सुनते ही मेरेको वहाँ की एक घटना याद आ गई। मैंने कहा– हाँ, एक नई बात हुई थी। फिर मैंने वो घटना सुनाई जो कुछ इस प्रकार थी– मैं गाँव में एक वृद्ध माता जी से मिलने गया। वो माताजी अन्दर से आई और घूँघट निकाल कर, दूसरी तरफ मुँह किये हुए बैठ गई। वैसे तो पुरानी माताएँ लज्जाके कारण बालक को देखकर भी घूँघट निकाल लेती है, पर बालक से बात कर लेती है। श्री स्वामी जी महाराज ने भी घूँघट निकाले हुए एक वृद्ध माताजी से कहा था, कि माजी! मैं तो आपके (सामने) पौते के समान हूँ। ऐसे ही एक बार, एक वृद्ध माताजी श्री स्वामी जी महाराज से कोई बात पूछ रही थी, उनके घूँघट निकाला हुआ देखकर श्री स्वामी जी महाराज ने मेरेको भी आदरपूर्वक बताया कि देख! (माँजी के घूँघट निकाला हुआ है)। ऐसे कई माताएँ दादी, परदादी बन जानेपर भी घूँघट निकालना नहीं छोड़ती। यह उनके स्वभाव में होता है। हमारे भारतवर्ष की यह रीति है, मर्यादा है। जगज्जननी श्री सीता जी के भी घूँघट निकालनेकी बात आई है। माताएँ लज्जाके अवसर पर तो घूँघट निकालती ही है, शोकके अवसर पर भी घूँघट निकाल लेती है। यहाँ, यह माताजी शोक का अवसर जानकर घूँघट निकाले बैठी थी।  
    जब वो माताजी बोली नहीं, तब मैंने पूछा कि क्या बात है। तब वो शोक जताती हुई बोली कि क्या करें, श्री स्वामी जी महाराज ने तो समाधि ले ली अर्थात् शरीर छोड़ दिया। जब मैंने उनकी यह बात सुनी, तब मेरे समझ में आया कि इनके पास भी कोई झूठी खबर पहुँच गई है। मैंने कहा कि (नहीं माजी! ऐसी बात नहीं है) श्री स्वामी जी महाराज ने शरीर नहीं छोड़ा है, मैं वहीं से आया हूँ, वे राजीखुशी हैं। जब उन्होंने यह बात सुनी, तब शोक छोड़ा और सामान्य हुई, नहीं तो वो झूठी बात को ही सच्ची मानकर शोक पालने में लग गई थी। इस प्रकार लोग बिना सोचे-समझे ही झूठी बात फैला देते हैं और दुनियाँ को दुख देनेका काम कर देते हैं। 
    फेसबुक पर भी किसीने एक अखबार की फोटो प्रकाशित करदी, जिसमें गलेके कैंसरकी बात कही गई है। 
    गलेमें कैंसर के भ्रमवाली एक घटना तो मेरे सामनेकी ही है– 
एक बार सभा में लोगोंको मैं श्री स्वामी जी महाराज की रिकॉर्ड- वाणी (प्रवचन) सुना रहा था। प्रवचनकी आवाज कुछ लोगोंको साफ सुनाई नहीं दी। (श्रीस्वामीजी महाराज जब सभामें बोलते थे तो उन प्रवचनोंकी रिकॉर्डिंग होती थी। उस समय गलती के कारण कभी-कभी आवाज साफ रिकॉर्ड नहीं हो पाती थी। वैसे तो साफ आवाजमें उनके बहुत-सारे प्रवचन हैं, पर कुछ प्रवचनोंकी आवाज साफ नहीं है)। इसलिये समाप्ति पर किसीने कहा कि आवाज साफ नहीं थी (कई बातें पकड़में नहीं आई)। 
    उस समय मेरे बोलनेसे पहले ही एक भाई उठकर खड़ा हो गया और लोगोंकी तरफ मुँह करके बोला कि सुनो-सुनो! (फिर वो बोला–) स्वामीजीके गलेमें कैंसर था, इसलिये प्रवचन की आवाज साफ नहीं थी। 
    मैंने आक्रोश में डाँटते हुए उससे पूछा कि आपको क्या पता? तो उसने जवाब दिया कि आप (संत) लोगोंसे ही सुना है?– ऋषिकेशके संतनिवासमें से ही किसीने ऐसा कहा था (मैं उनको जानता नहीं)।} फिर मैंने उनसे कहा कि (श्री स्वामी जी महाराज के) कैंसर नहीं था। मेरे को पता है, मैं उनके साथ में रहा हुआ हूँ। यह सुनकर, उन्होंने सरलतापूर्वक हाथ जोड़ लिये कि मेरेको पता नहीं था। ऐसे, सुनी-सुनाई बात लोग आगे कह देते हैं। 
(फोड़ेका इलाज)
    श्री स्वामी जी महाराज के सिरपर जो फोड़ा हो गया था और लोगोंने जिसको कैंसर कह दिया था, उसको साधारण इलाज से इस प्रकार ठीक किया गया–
    कम्पाउण्डरजीने पट्टी बाँधनेवाला कपड़ा (गोज) मँगवाया और उसके, कैंचीसे छोटे-छोटे कई टुकड़े करवाये। फिर उनको उबाले हुए पानीमें डाल दिया गया। बादमें उनको निकालकर निचौड़ा गया और थोड़ी देरतक उनको हवामें रख दिया गया। उसके बाद फोड़ेको धोकर, उसके ऊपरका भाग (खरूँट) हटा दिया गया। फिर फोड़ेको साफ करके उसपर वे, कपड़ेके टुकड़े रख दिये। उस कपड़ेकी कतरनने फोड़ेके भीतरकी खराबी (दूषित पानी आदि) सोखकर बाहर निकाल ली। फिर वे, कपड़े हटाकर दूसरे कपड़े रखे गये। इस प्रकार, कई बार करनेपर जब अन्दरकी खराबी बाहर आ गयी तब फोड़ेपर दूसरे, स्वच्छ कपड़ेके टुकड़े रखकर उसपर पट्टी बाँधदी गई। 
    शामको जब पट्टी खोली गई तो वे, कपड़ेके टुकड़े भीगे हुए मिले; उन टुकड़ोंने अन्दरकी खराबीको खींचकर सोख लिया था, इसलिये वे भीग गये थे, गीले हो गये थे। 
    तत्पश्चात उन सबको हटाकर सुबह की तरह, फिरसे नई पट्टी बाँधी गई। दूसरे दिन सुबह भी उसी विधिसे पट्टी की गई। ऐसा प्रतिदिन किया जाने लगा। 
    बीच-बीच में यह भी ध्यान गया कि घावका मुँह बन्द न हो। अगर कभी बन्द हो भी जाता तो उसको वापस खोला जाता था जिससे कि दूषित पानी आदि पूरा बाहर आ जाय।
    इस प्रकार सोखते-सोखते कुछ दिनोंके बाद वे, कपड़ेके टुकडे भीगने बन्द हो गये। फोड़ेके भीतरकी खराबी बाहर आ गयी तथा महीनेभर बादमें, वो फोड़ा ठीक हो गया। उस जगह पर साफ, नई चमड़ी आ गई।
    इसके बाद ऐसी ही विधि दूसरे लोगोंके घाव आदिको ठीक करनेके लिये की गई और उनके भी घाव ठीक हुए।
    इससे एक बात यह समझमें आयी कि ऊपरसे दवा लगानेकी अपेक्षा भीतरकी खराबी बाहर निकालना ज्यादा ठीक रहता है।
    डॉक्टर आदि कई लोगोंने ऊपरसे दवा लगा-लगा कर ही इलाज किया था, भीतरसे विकृति निकालनेका, ऐसा उपाय उन्होंने नहीं किया था। तभी तो उनको सफलता नहीं मिली। 
    ऐसे ही, गले के कफ का इलाज भी उन्होंने सुगमतापूर्वक कर दिया–
(कफका इलाज)
    कई बार श्री स्वामी जी महाराज के सर्दी, जुकाम आदि हो जाता था, गलेमें कफ हो जाता था, जिसके कारण सत्संग के समय भी बोलने में दिक्कत आती थी।
    सत्संग सुननेमें बाधा न हो– इसके लिये कभी-कभी श्री स्वामी जी महाराज के गले में गर्म कपड़ेकी पट्टी लपेटी जाती थी और कफ डालनेके लिये दौने आदि में मिट्टी रखी जाती थी; लेकिन उसका इलाज भी कम्पाउण्डरजीने एक साधारण-से उपाय द्वारा कर दिया।
    वे बोले कि स्वामीजी महाराजके सामनेसे यह (कफदानी वाला) बर्तन हटाना है और उसका उपाय यह बताया कि लोटा भर पानीमें एक दो चिमटी (चुटकी) नमक डालकर उबाल लो। जब चौथाई भाग जल रह जाय तब अग्निसे नीचे उतार लो और ठण्डा होनेपर इनको पिलादो।
    उनके कहनेपर ऐसा ही किया गया और कुछ ही दिनोंमें श्री स्वामी जी महाराज का गला ठीक हो गया। गलेका कफ चला गया और कफ डालनेके लिये रखा जानेवाला, मिट्टीका बर्तन भी हट गया। नहीं तो वर्षोंतक यह, कफवाली समस्या बनी रही थी।
    किसीने गलेमें लपेटी हुई उस समय की पट्टी को देखकर कैंसर समझ लिया होगा अथवा, कैंसरवाली गलतफहमीकी पुष्टि की होगी तो वो भी बिना जाने, अज्ञानता के कारण थी। वास्तव में, गलेमें पट्टी कैंसर के कारण नहीं लपेटी जाती थी, गलेवाले कफके कारण लपेटी जाती थी। जब कफ चला गया, तब गला ठीक हो गया। सिरवाला फोड़ा भी ठीक हो गया था। इस प्रकार, श्री स्वामी जी महाराज के न तो कभी गलेमें कैंसर हुआ था और न सिरपर। भगवान् की कृपासे सब ठीक था। 
    लोगोंमें एक (कल्पित)बात यह भी फैली हुई है कि एक डॉक्टर ने (यन्त्र के द्वारा) श्री स्वामी जी महाराज के गलेकी जाँच की, तो उसमें, डॉक्टर को ब्रह्माण्ड दिखायी दे गया। कोई कहते हैं कि डॉक्टर को वहाँ, भगवान् के दर्शन हो गये। 
    ऐसे ही कुछ कल्पित बातें, ये भी फैली हुई हैं– कोई कहते हैं कि श्री स्वामी जी महाराज धर्म के अवतार थे, कोई सञ्जय का और कोई विदुर जी का अवतार बता देते हैं। कोई तो कह देते हैं कि ये स्वयं, श्री जीयाराम जी महाराज ही थे। परन्तु श्री स्वामी जी महाराज ने इन बातों को स्वीकार नहीं किया है। ये लोगोंकी कल्पनाएँ हैं, वास्तविकता नहीं। 
    बीकानेर धोरेपर "भृगुसंहिता" के एक फलादेशका पन्ना लाया गया और श्री स्वामी जी महाराज के सामने ही कुछ लोगोंको सुनाया गया। उस पन्ने में श्री स्वामी जी महाराज के लिये लिखा था कि यह जीव द्वापरयुग के अन्तिम समय का है ... और गीता का प्रचार करेगा। कई लोग इसका प्रमाण देकर श्री स्वामी जी महाराज को "अवतार" बता देते हैं। लेकिन उसमें किसी अवतारी का नाम नहीं लिखा था (कि ये अमुकके अवतार हैं ) और न ही किसी महात्मा का नाम लिखा था (कि ये अमुक महात्मा ही हैं)। लोग बिना सोचे-समझे और सुनी-सुनाई बात बोल देते हैं। इसलिये यह समझना चाहिये कि वास्तव में, बात क्या है। ये महात्मा तो थे; परन्तु कौन महात्मा थे– इस बात का पता नहीं है। बिना जाने इनको किन्हीका अवतार या किसी नामवाले महात्मा बता देना सच्चाई नहीं है। 
    बिना समझे किसीको अवतार मानने में लाभ भी नहीं है। श्री स्वामी जी महाराज भी अवतार न बताने में लाभ मानते हैं। क्योंकि अवतार न मानने से तो कोई हिम्मत भी कर सकता है कि ऐसा मैं भी बन सकता हूँ, ऐसे मैं भी कर सकता हूँ, आदि और अवतार मानने से वैसी हिम्मत नहीं करता – कह, वो तो अवतार थे, इसलिये उन्होंने ऐसा कर लिया, हम थोड़े ही कर सकते हैं। हम अवतार थोड़े ही हैं जो ऐसा कर सकें। हम तो साधारण जीव हैं, आदि आदि। इसलिये हमें ऐसी कल्पनावाली बातों को महत्त्व न देकर स्वयं, उन महापुरुषों द्वारा कही हुई, वास्तविक बातोंको ही महत्त्व देना चाहिये। और उनसे लाभ लेना चाहिये। 
    एक बार की बात है कि श्री स्वामी जी महाराज को 'महासती सावित्री' नामक एक पुस्तक दिखाई गई, जिसमें सावित्री को अवतार के समान बताया गया था। तब श्री स्वामी जी महाराज ने पूछा कि श्री सेठजी ने (संक्षिप्त महाभारत में) क्या लिखा है? महाभारत देखने से पता लगा कि सावित्री को इस प्रकार अवतार नहीं बताया गया है। तब श्री स्वामी जी महाराज ने बताया कि श्री सेठजी के द्वारा बनाये गये ग्रंथों में सच्चाई है। [ऐसी सच्चाई हरेक लेखक की पुस्तक में नहीं मिलती]। फिर श्री स्वामी जी महाराज ने ऐसे महापुरुषों की कृत्ति की महिमा कही और निर्देश दिया कि श्री सेठजी के द्वारा संक्षिप्त किये गये ऐसे, पद्मपुराण आदि कल्याण के विशेषांकों में जो कथाएँ आयी है, उनको अलग से, पुस्तक रूप में छपवायी जायँ। (इससे लोगों का कल्याण होगा)। उसके बाद ऐसी कई पुस्तकें छापी गई, जिनमें प्रमुख हैं– रामाश्वमेध (लवकुश चरित्र), नल-दमयन्ती, सावित्री-सत्यवान आदि। इस प्रकार यह समझाया गया कि बिना जाने किसी महात्मा या सती आदि को अवतार मानना लाभदायक नहीं है। 
    कई लोग बोल देते हैं कि स्वामीजी महाराज पढ़े हुए नहीं थे, लेकिन उनकी यह बात सर्वथा झूठी है। श्री स्वामी जी महाराज तो जोरदार पढ़े हुए थे। वे संस्कृत पाठशाला में विद्यार्थियों को संस्कृत व्याकरण पढ़ाते थे। उन्होंने एक सज्जनको छः महीनों में ही पूरी ‘लघुसिद्धान्तकौमुदी’ पढ़ा दी थी (जबकि अन्य लोगों को लघुसिद्धान्तकौमुदी पढ़ाने में कई वर्ष लग जाते हैं)। हर किसीको कम समय में अधिक पढ़ानेकी युक्ति नहीं आती है। श्री स्वामी जी महाराज को पढ़ाने की और बात समझाने की बहुत बढ़िया युक्ति आती थी। इसके सिवाय उन्होनें छहों शास्त्रों की तथा अद्वैत सिद्धान्तकी, वेदान्त की भी पढ़ाई की और आचार्य तक की परीक्षा भी दी थी। वे तो शास्त्रों से भी ऊपर उठे हुए जीवन्मुक्त महापुरुष थे। ] 
    लोगों को गीता पढ़ाने के लिये श्री स्वामी जी महाराज ने गीता- पाठशाला खोल रखी थी। 
    उन्होंने गीताजी की प्रचण्ड टीका– 'साधक संजीवनी' लिखी है जिसकी बराबरी आज दुनियाँ में कोई भी गीताजी की टीका नहीं कर सकती। ऐसे ही गीता पर शोधपूर्ण ग्रंथ– 'गीता-दर्पण' लिखा है जिसके जोड़का भी दुनियाँ में कोई ग्रंथ नहीं है। अगर श्री स्वामी जी महाराज पढ़े हुए नहीं होते, तो गीताजी की ऐसी अद्वितीय टीका कैसे लिखते?
    जिन दिनों में कल्याण का पद्मपुराणांक निकला था, उस समय पद्मपुराण की हिन्दी टीका मिली नहीं। पद्मपुराण केवल संस्कृत भाषा में ही उपलब्ध हुआ था। तब श्री स्वामी जी महाराज ने श्री सेठ जी को संस्कृत- पद्मपुराण हिन्दी में सुनाया था। स्वामी जी महाराज पद्मपुराण के संस्कृत श्लोकों का हिन्दी में अनुवाद करते और श्री सेठ जी को सुनाते थे। सुनकर श्री सेठ जी (कल्याण के विशेषांक के लिये) संशोधन करते थे कि इतना अंश ले लो, यहाँ से यहाँतक ले लो आदि। अगर श्री स्वामी जी महाराज पढ़े हुए नहीं होते तो संस्कृत को हिन्दी में कैसे सुनाते और पाठशालामें विद्यार्थियोंको संस्कृत व्याकरण कैसे पढ़ाते? ऐसी बातों से सिद्ध होता है कि श्री स्वामी जी महाराज बहुत पढ़े हुए थे। उनकी सरलताके कारण हर किसीको उनकी विद्वत्ताका पता नहीं लगता। 
    लोग बिना जाने ही कल्पित बातें करते रहते हैं। कल्पित बातें न तो महापुरुषोंको पसन्द है और न ही कोई सच्चे आदमी को। महापुरुष तो जानी हुई, यथार्थबातें, सच्ची बातें ही करते हैं तथा लाभ भी सच्ची बातों से ही होता है।
    बहुत से लोग ऐसे हैं जो श्री स्वामी जी महाराज की वास्तविक, सच्ची बातें नहीं जानते। सत्संग करनेवाले लोगों में भी, वास्तविक बातें जाननेवाले कम हैं। वास्तविक बातोंकी आवश्यकता और महत्त्व समझनेवाले लोग बहुत कम हैं।
    कुछ लोग ऐसे भी देखने-सुनने में आये हैं कि श्री स्वामी जी महाराज के विषय में कोई बात, अपने मनसे ही गढ़कर कह देते हैं। कोई सत्यबातमें असत्य मिलाकर कहते हैं। कोई तो श्री स्वामी जी महाराज की प्रशंसा करते हुए भी झूठीबात बोल देते हैं। कोई श्री स्वामी जी महाराज की बात या व्यवहार को लेकर अपनी प्रशंसा में जोड़ देते हैं। कोई अपनी हल्की सोच के अनुसार श्री स्वामी जी महाराज और श्री सेठजी जैसे महापुरुषोंके लिये भी हल्की बात कह देते हैं। ऐसी बात भी कह देते हैं जो उन महापुरुषों के स्वभाव में ही नहीं है। श्री स्वामी जी महाराज ने बताया कि एक माई मेरे लिये बचपन की बात बताती हुई बोली कि स्वामीजी जब भिक्षा लाने के लिये जाते तो (हमारे) यहाँ बोरड़ी (बेरीवृक्ष) के झोली टाँग देते और खेल में लग जाते थे। श्री स्वामी जी महाराज ने कहा कि (झूठी बात है यह, क्योंकि) ऐसे मेरे स्वभाव में ही नहीं है कि मेरे को कोई काम के लिये भेजे और मैं बीच में ही किसी दूसरे काम में लग जाऊँ, खेल में लग जाऊँ। इस प्रकार लोग सोचते नहीं कि उनके लिये यह कैसे सम्भव है। यह तो उनके स्वभाव में ही नहीं है। उनके जीवन की तरफ भी नहीं देखते, उनके रहन- सहन और सिद्धान्तों पर भी विचार नहीं करते। उनका गौरव घटाने का काम कर देते हैं।
    ऐसे महापुरुषोंके लिये, कुछ लोगोंको तो घटिया बात कहने में भी शर्म नहीं आयी। किसीने तो श्री सेठजी के लिये घटिया और झूठी बात पुस्तक में भी लिख दी। किसीने बिल्वमङ्गलकी घटनाको श्री तुलसीदास जी महाराज की घटना बता दिया। ऐसे लोग दूसरेकी घटनाको संतोंकी घटना बता देते हैं, असत्य से भी परहेज नहीं करते।
    एक लेखक तो ऐसा देखने में आया कि श्री स्वामी जी महाराज की बात अपने मन के विरुद्ध लगी या अपने आचरण के खिलाफ लगी तो उस बात को ही हटा दिया और उसकी जगह अपने दूषित मनकी बात लिख दी। इस प्रकार अपना बचाव किया। ऐसे ही कुछ लोग महापुरुषों के काम को भी अनुचित बता देते हैं।
    कोई तो श्री स्वामी जी महाराज का नाम लेकर अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं। ऐसे लोग महापुरुषोंका गौरव घटाते हैं और गलत प्रचार करते हैं। इससे महापुरुषोंकी महिमा छिपती है और दुनियाँकी बड़ी भारी हानि होती है।
 

    वास्तवमें, उनके कैंसर न तो कभी गलेमें हुआ था और न सिरपर। किसी भी अंग में कैंसर नहीं हुआ था। उनके साथमें रहनेवाले, सत्संग करनेवाले, अनेक भाई बहन ऐसे हैं, जो इस बातको जानते हैं तथा मैंने भी, वर्षोंतक श्री स्वामी जी महाराज के पासमें रहकर देखा है और बहुत नजदीक से देखा है कि उम्रभर में, उनके किसी भी अंग में, कैंसर हुआ ही नहीं था। 

      निवेदक-                                           ( डुँगरदास राम )

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    इस प्रकार श्री स्वामी जी महाराज के विषय में जब लोग बिना सोचे-समझे, मनगढ़न्त बातें करने लग गये और वास्तविक, सच्ची बातें मिलनी मुश्किल हो गई, तब यह आवश्यक समझा गया कि श्री स्वामी जी महाराज की कुछ ऐसी बातें यहाँ लिखी जायँ, जो सच्ची हों, वास्तविक हों, प्रामाणिक हों और लोगोंको उन बातों से सही मार्गदर्शन मिल सके। वे ऐसी बातें हो कि जिनके सहारे लोग दूसरी, सही बातोंका निर्णय कर सकें और मनगढ़न्त बातोंका निराकरण करके, प्रामाणिक बातें कह सकें।  
    प्रामाणिक बातें वे हैं कि जिनको स्वयं– श्री स्वामी जी महाराज ने कहा हो; क्योंकि स्वयं की बातें, स्वयं से अधिक और कौन जान सकता है? इसलिये स्वयं श्री स्वामी जी महाराज से सुनी हुई बातों के ही कुछ भाव यहाँ लिखे जा रहे हैं— ... ××× 
— 'महापुरुषोंकी बातें और कहावतें' नामक पुस्तक से। 

शुक्रवार, 22 अगस्त 2025

(१०) श्री स्वामी जी महाराज द्वारा अपनी फोटोका निषेध

(१०) श्री स्वामी जी महाराज द्वारा अपनी फोटोका निषेध
    आजकल कई लोग श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराज का नाम लिखा हुआ एक चित्र (चुपचाप) एक-दूसरेको मोबाइल आदि पर भेजने लग गये हैं। इसमें वे चश्मा लगाये हुए, दाहिने हाथके द्वारा पीछे सहारा लिये हुए और अपने एक (दाहिने) पैर पर दूसरा (बायाँ) पैर रखे हुए तथा घुटनेपर बायाँ हाथ धरे हुए दिखायी दे रहे हैं। उस चित्रके नीचे किसीने नाम लिख दिया कि ये 'रामसुखदास जी महाराज' हैं। लेकिन यह अनुचित है। श्री स्वामी जी महाराज अपने चित्र के लिये मना करते थे।
    एक बार श्री स्वामी जी महाराज से किसीने पूछा कि लोगोंको आप अपना फोटो क्यों नहीं देते हैं? कई संत तो अपनी फोटो भक्तोंको देते हैं (और वे दर्शन, पूजन आदि करते हैं) आप भी अगर अपनी फोटो लोगोंको दें, तो लोगोंको लाभ हो जाय। जवाब में श्री स्वामी जी महाराज बोले कि हमलोग अगर अपनी फोटो देने लग जायेंगे तो भगवान् की फोटो बन्द हो जायेगी। (यह काम भगवद्विरोधी है)।
    एक बार किसीने श्री स्वामी जी महाराज को उनके गुरुजी– श्री कन्नीरामजी महाराजकी फोटो दिखायी। वो फोटो श्री स्वामी जी महाराज के बालक– अवस्था के समय की है। उसमें वे अपने गुरुजीके पास खड़े हैं, हाथ जोड़े हुए हैं। उस चित्रको देखकर महाराजजीने निषेध नहीं किया। इस घटनासे कई लोग उस चित्रके चित्रको अपने पासमें रखने लग गये और दूसरोंको भी देने लग गये (कि इस चित्रके लिये श्री स्वामी जी महाराजकी मनाही नहीं है)। उस चित्रके लिये श्री स्वामी जी महाराज ने शायद इसलिये मना नहीं किया कि वो फोटो गुरुजीकी है। इस चित्रके लिये श्री स्वामी जी महाराज ने न तो हाँ कहा और न ना कहा। इसलिये इस चित्रका दर्शन कोई किसीको करवाता है अथवा कोई करने को कहता है तो घाटे-नफेकी जिम्मेदारी स्वयं– उन्हीपर है।
    कई लोगोंके मनमें रहती है कि हमने श्री स्वामीजी महाराजके दर्शन नहीं किये। अब अगर उनका चित्र भी मिल जाय तो दर्शन करलें। ऐसे लोगोंके लिये तो सत्संगियोंके भी मनमें आ जाती है कि इनको चित्रके ही दर्शन करवादें। इनकी बड़ी लगन है। लेकिन यह उचित नहीं है। अगर उचित और आवश्यक होता तो श्री स्वामीजी महाराज ऐसे लोगोंके लिये व्यवस्था कर देते। चित्र-दर्शनके लिये व्यवस्था करना और करवाना तो दूर, ऐसा करनेवालोंको भी उन्होंने मना कर दिया। इसलिये यह चित्र-दर्शन करवाना भी उचित नहीं है। अगर उचित या आवश्यक होता तो श्री स्वामी जी महाराज मना क्यों करते? क्या उस समय ऐसे लोगों की चाहना नहीं थी?
    हमने तो सुना है कि जोधपुरमें किसी सत्संगी ने श्री स्वामी जी महाराज के कई चित्र बनवाकर कई लोगोंको दे दिये। तब श्री स्वामी जी महाराज ने लोगोंसे वे फोटो वापस मँगवाये और उन सब चित्रों को जलाया गया। इसका वर्णन 'विलक्षण संत-विलक्षण वाणी' नामक पुस्तकमें भी है। इसमें श्री स्वामी जी महाराज द्वारा अपनी फोटो-प्रचारके खिलाफ लिखाये गये पत्र भी दिये गये हैं और क्यों महाराजजी वृन्दावनसे जोधपुर पधारे तथा लोगोंको क्या-क्या कहा-इसका भी वर्णन है।
    इस पुस्तकमें 'परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराज' का जोधपुरमें किये गये 'चित्र-प्रचारका दुख' भी बताया गया है। उसमें यह भी बताया गया है कि यह चित्र- प्रचार नरकोंमें जाने का रास्ता है। श्री स्वामी जी महाराज ने अपनी वसीयतमें भी चित्रका निषेध किया है। निषेध काम को करने से वंश नष्ट हो गया– यह आगेवाले प्रसंग में देखें–
(११) निषेध (वर्जित) कामको करने से भारी नुकसान, घटना
    श्री स्वामी जी महाराज बताते हैं कि महापुरुषों की बात के अनुसार जो नहीं करता है, तो (आज्ञा न माननेसे) वो उस लाभसे वञ्चित रहता है (दण्डका भागी नहीं होता) परन्तु जिसके लिये महापुरुषोंने निषेध किया है, मना किया है, उस काम को कोई करता है, उस बात को नहीं मानता है तो वो दण्ड का भागी होता है। उसको दण्ड मिलता है।
    श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज की पुरानी वसीयत (22 जनवरी 1980_8:30 बजे) की ओडियो रिकॉर्डिंग है। उसमें श्री स्वामी जी महाराज कहते हैं कि– (23 मिनट से) ... वही बात आपलोगों से कहता हूँ क आप भी उन संत- महात्माओं की आज्ञा के अनुसार जीवन बनावें, तो इससे लाभ जरूर होगा– इसमें मेरे सन्देह नहीं है। मैंने कई बातें सुणी है, जैसे– शाहपुरा के मुरलीराम जी महाराज थे। हरिपुर में जो थाम्बा है। उन्होंने ऐसा कह दिया कि मेरे पीछे स्मारक और (आदि) मत बणाणा। तो वहाँ के गृहस्थों ने जो कि अग्रवाल थे। उन्होंने चबूतरा बनाया। तो उनका बंश नष्ट हो गया। येह बात मैंने सुणी है, कहाँतक सच्ची है– परमात्मा जानें। . (प्रश्न–) ठीक है? (श्रोता–) ठीक (है)। श्री स्वामी जी महाराज– ये संत– शाहपुरा के कहते हैं कि ठीक है (सही बात है)। (प्रवचनके अंशका यथावत-लेखन).
    (25 मिनट से) मेरे साथ ऐसा अन्याय किया है लोगों ने– छिपकर के चित्र उतारा है, बड़ा अपराध मानता हूँ (यह)। एक पाप होता है, एक अपराध होता है। पाप का डण्ड भोगणे से पाप शान्त हो जाता है, पण (परन्तु) अपराध शान्त नहीं होता। अपराध तो जिसका किया जाय, वो ही अगर क्षमा करे तो हो ज्याता है, नहीं तो बड़ा बज्रपाप होता है, डण्ड होता है। अपराध होता है वो। तो ऐसे मेरे साथ में अन्याय किया है लोगों ने। और उसका अनुमोदन किया है छिप- छिपकर के बहनों और भाइयों ने। तो (वो) बड़ा दोष मानता हूँ। वो ठीक नहीं है। अर (और) मेरे साथ ऐसा अन्याय करणा नीं (नहीं) चाहिये। उससे लाभ के बदले हानि की सम्भावना है। (प्रवचनके अंशका यथावत-लेखन).
    भक्त का अपराध भगवान् भी नहीं सहते। श्री स्वामी जी महाराज की पुस्तक ‘जित देखूँ तित तू’ में लिखा है कि–
    जिस तरह भक्तिमें कपट, छल आदि बाधक होते हैं, उसी तरह भागवत – अपराध भी बाधक होता है। भगवान् अपने प्रति किया गया अपराध तो सह सकते हैं, पर अपने भक्तके प्रति किया गया अपराध नहीं सह सकते। देवताओंने मन्थरामें मतिभ्रम पैदा करके भगवान् रामको सिंहासनपर नहीं बैठने दिया तो इसको भगवान् ने अपराध नहीं माना । परन्तु जब देवताओंने भरतजीको भगवान् रामसे न मिलने देनेका विचार किया, तब देवगुरु बृहस्पतिने उनको सावधान करते हुए कहा-
सुनु सुरेस रघुनाथ सुभाऊ। निज अपराध रिसाहिं न काऊ ॥
जो अपराधु भगत कर करई। राम रोष पावक सो जरई॥
लोकहुँ बेद बिदित इतिहासा। यह महिमा जानहिं दुरबासा ॥
            (मानस, अयोध्या० २१८ २-३ )
    शंकरजी भगवान् रामके ‘स्वामी’ भी हैं, ‘दास’ भी हैं और ‘सखा’ भी हैं—‘सेवक स्वामि सखा सिय पी के’ (मानस, बाल० १५ । २) । इसलिये शंकरजीसे द्रोह करनेवालेके लिये भगवान् राम कहते हैं—
सिव द्रोही मम भगत कहावा । सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा ॥
संकर बिमुख भगति चह मोरी । सो नारकी मूढ़ मति थोरी ॥
संकरप्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास ।
ते नर करहिं कलप भरि घोर नरक महुँ बास ॥ (मानस, लंका० २।४, २)
अतः साधकको इस भागवत अपराधसे बचना चाहिये। (‘जित देखूँ तित तू’, पृष्ठ २३,२४;)।
महापुरुषों ने चित्र के लिये मना किया है। इसलिये उनके चित्र का प्रचार न करें।
    इस प्रकार यह समझ लेना चाहिये कि श्रीस्वामीजी महाराज ने जिस वस्तु को पूजा अथवा स्मृतिरूप में रखने के लिये मना किया है, वो न रखें। किसी वस्तु, स्थान, कमरा, स्टेज आदि को इस प्रकार महत्त्व न दें जिससे लोगों को स्मृतिरूप में रखने आदि की प्रेरणा मिले। दूसरे लोग ऐसी भूल करे तो उनको भी प्रेम से समझाने की कोशिश करें।
— 'महापुरुषोंकी बातें और कहावतें' नामक पुस्तक से

(९) श्री सेठजी द्वारा अपने चित्रका निषेध-



(९) श्री सेठजी द्वारा अपने चित्रका निषेध-
    ऐसे ही सेठजी श्री जयदयालजी गोयन्दका भी अपने चित्र-प्रचार के लिए मना करते थे। श्री सेठ जी ने एक प्रसिद्ध संत से कहा कि आप लोगोंको अपनी फोटो देते हो, इसमें आपका भला है या लोगोंका? सुनकर उनको चुप होना पड़ा, जवाब नहीं आया।  
    कहते हैं कि एक बार किसी ने श्री सेठ जी से निवेदन किया कि हम आपका फोटो खींचना चाहते हैं। सुनकर श्री सेठ जी बोले कि पहले मेरे सिरपर जूती बाँध दो और फिर (सिरपर बँधी हुई जूती समेत फोटो) खींच लो। ऐसा जवाब सुनकर फोटो के लिये कहने वाले समझ गये कि इनको अपनी फोटो बिल्कुल पसन्द नहीं है। कोई फोटो लेता है तो इनको कितना बुरा लगता है। 
    (यहाँ श्री सेठ जी के एक प्रवचन का कुछ अंश दिया जा रहा है, जिसमें उन्होंने भाईजी और अपने स्मारक का निषेध किया है। इसमें भाईजी और श्री सेठ जी के चित्र का निषेध भी पढ़ना चाहिये–) 
   नाम तथा रूपकी पूजा कल्याणमें बाधक 
( परमश्रद्धेय सेठ जी श्री जयदयाल जी गोयन्दका द्वारा दिनांक-३०-३- १९४१, प्रातःकाल, श्रीजीका बगीचा, वृन्दावन में दिये गये प्रवचनका अंश—)
    मनुष्यके ऊपर उठनेमें मान-बड़ाईकी इच्छा बहुत बाधक होती है। मरनेपर मेरा नाम चले। इसी स्मृतिके लिये लोग स्मारक बनाते हैं। यह मामला गड़बड़ मालूम देता है। प्रायः यह बहुतोंमें ही रहता है। अच्छे-अच्छे साधु, नेता इस तरहकी व्यवस्था करते हैं कि स्मृति रहे। यह अन्धकारकी बात है।
    कहनेका विशेष उद्देश्य यह है कि मैं या भाईजी मर जायँ तो पीछेसे किसीको हमलोगोंके लिये कोई स्मृति या स्मारक नहीं बनवाना चाहिये। मरनेके बाद मैं कहने कैसे आऊँगा । अतः अभीसे कह देता हूँ। भाईजीके लिये भी मैं कहता हूँ।
    भगवच्चर्चा के लिये यह निषेध नहीं है। व्यक्तिगत नाम और रूपकी पूजाकी बात है। नाम, रूप तो मिटा ही दे।
    प्रारम्भमें एक दो पुस्तकें तैयार हुईं तो मैंने नाम देनेका निषेध किया था। पीछे लेखोंमें भाईजीने छाप दिया और लेखोंकी पुस्तकें बन गयीं। इसके सिवा और किसी रूपमें नाम, रूपका प्रचार नहीं होने दें।
    फोटो पूजना रूपकी पूजा है। स्मारक बनाना नामको पूजना है। ज्ञानी या भक्त कोई भी हो, जिनका नाम रूप प्रचलित होता है, लोग कहते हैं, यदि उनका वास्तवमें विरोध होता तो उनके अनुयायी लोग उनके नाम, रूपकी पूजा क्यों करते ?
    हमारे मरनेपर कोई हमारे लिये शोक सभा न करे। नाम, रूप कायम रखनेकी कोई चेष्टा न करे। जो लोग हमारे इस भावका प्रचार करेंगे वे ही हमारे अनुयायी हैं।
    मंगलनाथजीमें जितनी मेरी श्रेष्ठ बुद्धि थी या है, उतनी मेरे जीवनमें किसी जीवित मनुष्यमें नहीं हुई। पर मैं उनके नाम व चित्रका प्रचार नहीं करता। उनके सिद्धान्तोंका प्रचार करता हूँ।
    व्याख्यानके समय उनकी स्मृति हो जाती है, उनकी युक्तियोंका खयाल करके बातें भी कही जाती हैं, पर उनके नाम, रूपका प्रचार मैं कभी नहीं करता। उनका जो भाव था, उसीका हमें प्रचार करना चाहिये। यदि यह बात कही जाय कि उनके द्वारा मनाही की बात यों ही कहनामात्र था तो इसमें तीन दोष आते हैं- झूठ, कपट और दम्भ । 
    मेरा चित्र मेरे घर में है। यदि मेरा शरीर पहले शांत हो जय, मेरी स्त्री उसे रखना चाहे तो मेरा विरोध नहीं है, पर चित्र घरके बाहर न निकले। मुझे पूरा भरोसा है कि हरिकृष्ण या शिवदयाल कभी उस चित्रकी नकल किसीको नहीं लेने देंगे। एक चित्र श्री ज्वालाप्रसादजीके पास है। उनसे प्राप्त करनेकी पहले बहुत चेष्टा की गयी पर उनसे बहुत प्रेम था, उन्होंने नहीं दिया, यदि उनसे लिया जाय तो उनको बहुत दुःख होगा। इस कारण विचार होता है।
    प्रश्न- भक्त या ज्ञानी किस दृष्टिसे ऐसी बात चाहते हैं?
    उत्तर- भक्त तो अपने स्वामीकी ही पूजा चाहता है, उसीके नामका प्रचार चाहता है। वह नौकर नालायक है, बेईमान है, भगवान्‌को धोखा दे रहा है, जो भगवान्‌के बदले में अपने नाम- रूपको पुजवाता है। मालिककी दुकानपर अपना नाम चलानेवाला नौकर क्या मालिकको अच्छा लग सकता है। भगवान्‌के भक्तको भगवान के नाम, रूप, गुणका प्रचार करना चाहिये।
    मनुष्यके क्षणभङ्गुर, नाशवान् शरीरको पुजवानेसे क्या लाभ? मेरा पाँच वर्ष पहलेका चित्र यदि हो तो उसमें और आजके चित्रमें कितना अन्तर होगा। ऐसे ही सभी चित्रोंमें कौन-सा सच्चा है? कोई नहीं। 
   भगवान्‌का रूप-नाम कितना मधुर है। यदि पहले जन्मका मेरा चित्र कहीं पूजा जाता हो तो उससे मुझे क्या लाभ हो रहा है। मेरी पुस्तकोंमें, लेखोंमें, भगवान् विष्णु, राम, कृष्णकी ही प्रशंसा मिलेगी। यदि भक्तोंके चित्रोंकी प्रचारकी दृष्टि होती तो मंगलनाथजी महाराजके चित्रका खूब प्रचार करते। 
    ज्ञानीकी दृष्टिसे बतलाया जाता है। पूजनकी दृष्टिसे पूजे तो उसे छोटा बना रहा है। ज्ञानी तो ब्रह्म ही हो गया, साक्षात् परमात्मा हो गया। पूजक लोग उसे छोटा बना रहे हैं। उसे महात्मा कह रहे हैं, उसे ब्रह्मसे न्यारा कर रहे हैं। उसके नाम, रूपको ब्रह्मसे अलग निकाल रहे हैं।
   महात्माकी दृष्टिसे यदि वह अपने नाम, रूपकी पूजा चाहता है तो वह ब्रह्मको प्राप्त ही नहीं हुआ। अपने वर्तमान नाम, रूपमें उसका अभिमान है, तभी वह उसकी पूजा चाहता है, अन्यथा उसे यही समझना चाहिये कि राम, कृष्णका नाम, मेरा ही नाम है। उनकी पूजा मेरी ही पूजा है। यदि वह अलग नाम, रूपकी पूजा चाहता है तो राम, कृष्णसे अपनेको अलग मानता है। यदि मैं जयदयालके नाम, रूपसे आप लोगोंका लाभ समझता हूँ, आपको पूजक और अपनेको पूज्य समझता हूँ तो देहाभिमान और किसका नाम है।
    स्त्री पतिकी, पुत्र माता-पिताकी पूजा करे, यह लाभकी बात है। परमात्मा सबसे ऊँचे हैं। अपनी श्रद्धासे अपने गुरुको ईश्वर तुल्य मान सकता है, पर ईश्वर नहीं । अन्यथा यह ईश्वरको मटियामेट करनेकी-सी बात है। यह सिद्धान्तकी बात है । नहीं तो इतने ईश्वर खडे हो जायँगे कि आपको वास्तविक ईश्वरका पता लगाना कठिन हो जायगा। 
   दम्भ-पाखण्डके पेटमें मान-बड़ाई या धनकी इच्छा ही है। जितने काम विश्वमें भगवान्‌के विरुद्ध हो रहे हैं, उनसे भगवान् प्रसन्न नहीं हैं। अधिकार दे दिया। लोग भगवान्‌का दुरुपयोग कर रहे हैं, अतः दण्ड मिलेगा। आगे अधिकार नहीं रहेगा। बन्दूक छीन ली जायगी। अच्छा काम करेगा, उसे दुबारा बन्दूक मिल जायगी और पुरस्कार भी मिलेगा।
    हरेकमें यह बात आ जानी चाहिये कि भगवान् के मन्दिरमें भगवान्‌की जगहपर किसी मनुष्यकी पूजा करनी यह घृणा करने योग्य बात है। यदि उन महात्माओंने स्वयं इस प्रकारका प्रचार करवाया है, तब तो वे महात्मा ही नहीं थे। यदि उनके अनुयायियोंने उनकी बात न मानकर यह प्रचार किया है तो उन्होंने उस महात्माका सिद्धान्त नहीं समझा।
    यह सिद्धान्तकी बात है, हम सोचेंगे तो हमको प्रिय लगेगी, बड़ी ठोस बात है। सत्य बोलना चाहिये, परस्त्रीको माँके समान समझना चाहिये। ठोस सिद्धान्तकी बात है। 
    अन्यायसे धन अर्जित करनेवाला लोभी ही नहीं, अपितु पापी भी है। न्यायसे अर्जित करनेवाला भी लोभी है। जहाँ खर्च करना न्याय हो वहाँ खर्च नहीं करता, वह भी लोभी है। वैराग्यवान् हो तो न्यायसे भी अर्जित होना उसे अच्छा नहीं लगता।
    दूसरी स्त्रीपर कुदृष्टि जाना तो पाप है ही, अपनी स्त्रीके साथ भी अन्याययुक्त भोग भोगना पाप ही है। न्याययुक्त भोग शास्त्र प्रणालीसे हो, वहाँ भी यदि भोग-बुद्धि है, वह काम तो है ही ।पापका अभाव है, पर कामका अभाव नहीं है। वहाँ वैराग्य कहाँ। 
    अनुचित क्रोध पाप रूप है। स्त्री बालकोंको शिक्षा देनेके लिये यदि न्याययुक्त क्रोध हो, उसमें आपत्ति नहीं है। वह भी यदि वास्तवमें क्रोध है तो वह दोष ही है। क्रोधका अभिनय हो
तो आपत्ति नहीं।
    सूक्ष्म काम, क्रोध भी स्थूल होकर गिरानेमें हेतु बन सकते हैं, अतः इनकी जड़ काट डालनी चाहिये ।
    काम, क्रोध, लोभ – यह सब बातें खूब अच्छी तरह अनुभव की हुई हैं। काम-क्रोध-लोभ खूब बाधा डालते रहे हैं । प्रकृति लोगोंकी भिन्न-भिन्न रहती है, पर सबसे अधिक बलवान् काम है। मेरेपर कामका जोर अधिक रहा, क्रोधका जोर नहीं रहा । लोभके लिये बीचकी स्थिति रही ।
    किसी भी भक्तका भक्तके रूपमें प्रचार होना कोई आपत्तिकी बात नहीं है। उनके आचरण, गुण, क्रिया, सिद्धान्त, उपदेश, कथन – इनको जितना स्वयं धारण कर सके, दूसरोंमें करवा सके, उसके समान उस महात्माको कोई प्रिय नहीं होता । उसके माता-पिता एवं प्राण भी उसे इतने प्रिय नहीं लगते, जितना प्रिय वह सिद्धान्तका प्रचारक लगता है। भगवान् स्वयं कहते हैं— 
        न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः। 
        भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥                                                (गीता १८ । ६९)
      उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करनेवाला मनुष्योंमें कोई भी नहीं है; तथा पृथ्वीभरमें उससे बढ़कर मेरा प्रिय दूसरा कोई भविष्यमें होगा भी नहीं । 
    नाम और रूप तो भगवान् का ही प्रचार करनेके योग्य है। सिद्धान्त भगवान् का ही है। गीताके वचन स्वयं भगवान्‌के ही वचन हैं। गीताकी बातें जो मेरी समझमें आयी हैं, वे बातें कही जाती हैं। उनका पालन करनेवालेके उद्धार में कोई शंकाकी बात नहीं है। मेरे नाम, रूपकी पूजाकी कोई बात करे तो उसका मैं विरोध ही करूँगा। 
    सिद्धान्तकी बातको काममें लानेवालेके उद्धार होनेमें कोई शंकाकी बात नहीं, किन्तु कहनेवाले इस शरीरकी, वक्ताकी कोई पूजा करे, इसकी सेवा करे, आश्रय ले, उसके लिये मैं पाव आने भर भी उत्तरदायी नहीं हूँ । उसका कोई हित होगा, यह बात नहीं कही जा सकती। मैं एक तुच्छ मनुष्य हूँ। भगवान् ने रामायणमें, गीतामें जो बातें कही हैं, उनकी ओर ध्यान देना चाहिये । 
    भगवान् के नाम-रूपकी तरह कोई मनुष्य अपनी पूजा कराने लगे तो यह पतनका ही मार्ग है। यदि कोई कहे कि गुरु परम्पराकी रक्षा करनेके लिये मैं ऐसा करता हूँ, हमें यह ठेका क्यों लेना चाहिये। रक्षा करनेवाला अपने आप करेगा। यह सिद्धान्तकी बातें हैं । सिद्धान्तका ही डाली पत्ता है, उसीका अंश है।
    मेरे एक साथी चरण धोकर पिलाना तथा जुठन खिलाना आदि व्यवहार करते थे, उनका पतन हो गया। हमलोगोंको भगवान् शिक्षा दे रहे हैं कि तुमलोग खूब सावधान रहो। हम भी यदि नहीं चेतते तो हमारी यह दशा होती। मैं यदि एकान्तमें भी इनको कुछ भी गुंजाइश दूँ तो सभामें इनका ऐसा विरोध कैसे कर सकता हूँ।
    मैं और स्वामीजी ऋषीकेश सत्संगमें जाते हैं। लोगोंके आग्रहवश लोगोंके तथा मेरे रुपये सब मिलाकर साधुओंको अन्न, वस्त्र आदि बाँटनेका काम किया जाता है। ऐसा काम करना स्वामीजीके लिये तो बिलकुल ठीक नहीं है। मेरे लिये भी यह दो नम्बरका काम है। पर यह काम जुड़ गया है। पीछे वो समझमें आ गयी। किसी प्रकार भी लोगोंसे रुपयोंका सम्बन्ध न जुड़ना ही ठीक है । बीचमें दलाल न बनें। किसीको आवश्यकता हो, वह स्वयं ही जाकर लगा दे। अपने स्वयंके रुपये हो तो लगा दे, दूसरोंसे सम्बन्ध न जोड़े।
    बहुत पहले मैं लोगोंके उपकारके लिये माँगकर लाता था। तीस वर्ष पहलेकी बात है । चक्रधरपुरमें एक साधुको कम्बल दिलानेके लिये हरिकृष्णको कुछ रुपये जमा करनेके लिये भेजा । एकने कहा कि आप साथ आ गये, अतः जो कुछ देते हैं, वह आपको ही देते हैं। हरिकृष्णको यह बात बुरी लगी कि आगे से अपने पास हो वह दो, किन्तु माँगने मत जाओ ।
    बादमें यह भी शिक्षा मिली। मेरे कुछ धनी मित्र कह देते, तेरे जँचे उस अच्छे काममें हमारा रुपया भी लगा देना। उसमें भी उलाहना मिला कि इसलिये भार थोड़े ही दिया था कि इतना लिखा दें। तबसे कोई भार दे तो स्पष्ट कह दिया जाता है कि भार उठाने लायक मैं नहीं हूँ । 
××× 
(—‘भगवत्प्राप्तिकी अमूल्य बातें’ नामक पुस्तक के ‘नाम तथा रूपकी पूजा कल्याणमें बाधक’ नामक लेख से।)
— 'महापुरुषोंकी बातें और कहावतें' नामक पुस्तक से


शनिवार, 29 जून 2024

(११) बरसी आदि का निषेध

(११) बरसी आदि का निषेध
    भगवान् के तो जन्म दिवस पर और महात्माओं के निर्वाण दिवस पर उत्सव मनाया जाता है; क्योंकि इस दिन उन सन्तों का भगवान् से मिलन हुआ है। इसलिये बरसी मनाई जाती है। बरसी मनाना अच्छा काम है, परन्तु श्रीस्वामीजी महाराज ने अपनी बरसी आदि का निषेध (मना) किया है, इसलिये यह अच्छा काम होने पर भी नहीं करना चाहिये।
    आजकल कई लोग गुप्त या प्रकटरूप से कुछ अंश में श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदास जी महाराज की बरसी मनाने लग गये, जो कि उचित नहीं है।
    इस दिन कोई तो कीर्तन करते हैं और कोई गीतापाठ आदि का प्रोग्राम रखते हैं। (मानो वो इस प्रकार बरसी मनाते हैं)।
    लेकिन इस बात पर ध्यान देना चाहिये कि बरसी के लिये श्रीस्वामीजी महाराज ने मना किया है।
    "एक संतकी वसीयत" नामक पुस्तक के दसवें पृष्ठ पर बरसी आदि का निषेध करते हुए लिखा है कि-
    " जब सत्रहवीं का भी निषेध है तो फिर बरसी (वार्षिक तिथि) आदि का भी निषेध समझना चाहिये। "
    इस में बरसी के लिये मना लिखा है, फिर भी लोग बरसी मनाते हैं, चाहे आंशिक रूप से ही हो। इससे लगता है कि या तो उन लोगों को इस बात का पता नहीं है या वे इस बात की परवाह नहीं करते अथवा यह भी हो सकता है कि लोगों ने ध्यान देकर इस पुस्तक को पढ़ा नहीं। नहीं तो जिस काम के लिये महापुरुषों ने मना किया है, वो क्यों करते?
    इसलिये कुछ अंश में लोग जो बरसी मनाने लगे हैं, वो भूल में हैं। कीर्तन, गीतापाठ आदि करना तो अच्छा काम है, भले ही रोजाना करो; पर बरसी के उद्देश्य से कोई ये करते हैं तो यह ठीक नहीं है। उनको विचार करना चाहिये। इसी प्रकार अन्य कामों में भी समझना चाहिये।■ 
('महापुरुषोंकी बातें और कहावतें' नामक पुस्तक से)
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गुरुवार, 27 जून 2024

अपनी फोटोका निषेध क्यों है?(श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराज अपनी फोटोका निषेध करते थे)।

अपनी फोटोका निषेध क्यों है?


(९) अपनी फोटोका निषेध


    आजकल कई लोग श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराज का नाम लिखा हुआ एक चित्र (चुपचाप) एक-दूसरेको मोबाइल आदि पर भेजने लग गये हैं। इसमें वे चश्मा लगाये हुए, दाहिने हाथके द्वारा पीछे सहारा लिये हुए और अपने एक (दाहिने) पैर पर दूसरा (बायाँ) पैर रखे हुए तथा घुटनेपर बायाँ हाथ धरे हुए दिखायी दे रहे हैं। उस चित्रके नीचे किसीने नाम लिख दिया कि ये 'रामसुखदास जी महाराज' हैं। लेकिन यह अनुचित है। श्री स्वामी जी महाराज अपने चित्र के लिये मना करते थे।


    ऐसे ही सेठजी श्री जयदयालजी गोयन्दका भी अपने चित्र-प्रचार के लिए मना करते थे। श्री सेठ जी ने एक प्रसिद्ध संत से कहा कि आप लोगोंको अपनी फोटो देते हो, इसमें आपका भला है या लोगोंका? सुनकर उनको चुप होना पड़ा, जवाब नहीं आया।


    कहते हैं कि एक बार किसी ने श्री सेठ जी से निवेदन किया कि हम आपका फोटो खींचना चाहते हैं। सुनकर श्री सेठ जी बोले कि पहले मेरे सिरपर जूती बाँध दो और फिर (सिरपर बँधी हुई जूती समेत फोटो) खींच लो। ऐसा जवाब सुनकर फोटो के लिये कहने वाले समझ गये कि इनको अपनी फोटो बिल्कुल पसन्द नहीं है। कोई फोटो लेता है तो इनको कितना बुरा लगता है।


    एक बार श्री स्वामी जी महाराज से किसीने पूछा कि लोगोंको आप अपना फोटो क्यों नहीं देते हैं? कई संत तो अपनी फोटो भक्तोंको देते हैं (और वे दर्शन, पूजन आदि करते हैं) आप भी अगर अपनी फोटो लोगोंको दें, तो लोगोंको लाभ हो जाय। जवाब में श्री स्वामी जी महाराज बोले कि हमलोग अगर अपनी फोटो देने लग जायेंगे तो भगवान् की फोटो बन्द हो जायेगी। (यह काम भगवद्विरोधी है)।


    एक बार किसीने श्री स्वामी जी महाराज को उनके गुरुजी– श्री कन्नीरामजी महाराजकी फोटो दिखायी। वो फोटो श्री स्वामी जी महाराज के बालक– अवस्था के समय की है। उसमें वे अपने गुरुजीके पास खड़े हैं, हाथ जोड़े हुए हैं। उस चित्रको देखकर महाराजजीने निषेध नहीं किया। इस घटनासे कई लोग उस चित्रके चित्रको अपने पासमें रखने लग गये और दूसरोंको भी देने लग गये (कि इस चित्रके लिये श्री स्वामी जी महाराजकी मनाही नहीं है)। उस चित्रके लिये श्री स्वामी जी महाराज ने शायद इसलिये मना नहीं किया कि वो फोटो गुरुजीकी है। इस चित्रके लिये श्री स्वामी जी महाराज ने न तो हाँ कहा और न ना कहा। इसलिये इस चित्रका दर्शन कोई किसीको करवाता है अथवा कोई करने को कहता है तो घाटे-नफेकी जिम्मेदारी स्वयं– उन्हीपर है।


एक दृष्टि से तो यह भी चित्र का प्रचार और उसके लिये प्रोत्साहन ही है। लोगों के मन में श्री स्वामी जी महाराज का चित्र देखने और दिखाने की ही आयेगी, जो कि उचित नहीं है। 


इसलिये अपना भला चाहनेवालों को श्री स्वामीजी महाराज का चित्र न तो अपने पास में रखना चाहिये और न दूसरों को रखने की प्रेरणा देनी चाहिये। दूसरा कोई ऐसा करे तो उसको भी मना करना चाहिये, समझाना चाहिये। 


    कई लोगोंके मनमें रहती है कि हमने श्री स्वामीजी महाराजके दर्शन नहीं किये। अब अगर उनका चित्र भी मिल जाय तो दर्शन करलें। ऐसे लोगोंके लिये तो सत्संगियोंके भी मनमें आ जाती है कि इनको चित्रके ही दर्शन करवादें। इनकी बड़ी लगन है। लेकिन यह उचित नहीं है। अगर उचित और आवश्यक होता तो श्री स्वामीजी महाराज ऐसे लोगोंके लिये व्यवस्था कर देते। चित्र-दर्शनके लिये व्यवस्था करना और करवाना तो दूर, ऐसा करनेवालोंको भी उन्होंने मना कर दिया।। इसलिये यह चित्र-दर्शन करवाना भी उचित नहीं है। अगर उचित या आवश्यक होता तो श्री स्वामी जी महाराज मना क्यों करते? क्या उस समय ऐसे भावुकों की चाहना नहीं थी?


    हमने तो सुना है कि जोधपुरमें किसी भावुकने श्री स्वामी जी महाराज के कई चित्र बनवाकर कई लोगेंको दे दिये। तब श्री स्वामी जी महाराज ने लोगोंसे वे फोटो वापस मँगवाये और उन सब चित्रों को जलाया गया। इसका वर्णन 'विलक्षण संत-विलक्षण वाणी' नामक पुस्तकमें भी है। इसमें श्री स्वामी जी महाराज द्वारा अपनी फोटो-प्रचारके खिलाफ लिखाये गये पत्र भी दिये गये हैं और क्यों महाराजजी वृन्दावनसे जोधपुर पधारे तथा लोगोंको क्या-क्या कहा-इसका भी वर्णन है।


    इस पुस्तकमें 'परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराज' का जोधपुरमें किये गये 'चित्र-प्रचारका दुख' भी बताया गया है। उसमें यह भी बताया गया है कि यह चित्र- प्रचार नरकोंमें जाने का रास्ता है। 

[ BOOK- विलक्षण संत-विलक्षण वाणी - स्वामी रामसुखदास जी - Google समूह - https://groups.google.com/forum/m/#!msg/gitapress-literature/A7HF0iky-QU/YdG9gooWVpwJ ] 


श्री स्वामी जी महाराज ने अपनी वसीयतमें भी चित्रका निषेध किया है। निषेध काम को करने से वंश नष्ट हो गया– यह आगेवाले प्रसंग में देखें–


(१०) निषेध (वर्जित) कामको करने से भारी नुकसान, घटना

    श्री स्वामी जी महाराज बताते हैं कि महापुरुषोंके कहनेके अनुसार जो नहीं करता है, तो (आज्ञा न माननेसे) वो उस लाभसे वञ्चित रहता है (दण्डका भागी नहीं होता) परन्तु जिसके लिये महापुरुषोंने निषेध किया है, मना किया है, उस आज्ञाको कोई नहीं मानता है तो उसको दण्ड होता है।


    श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज की पुरानी वसीयत (22 जनवरी 1980_8:30 बजे) की ओडियो रिकॉर्डिंग है। उसमें श्री स्वामी जी महाराज कहते हैं कि– (23 मिनट से) ... वही बात आपलोगों से कहता हूँ क आप भी उन संत- महात्माओं की आज्ञा के अनुसार जीवन बनावें, तो इससे लाभ जरूर होगा– इसमें मेरे सन्देह नहीं है। मैंने कई बातें सुणी है, जैसे– शाहपुरा के मुरलीराम जी महाराज थे। हरिपुर में जो थाम्बा है। उन्होंने ऐसा कह दिया कि मेरे पीछे स्मारक और (आदि) मत बणाणा। तो वहाँ के गृहस्थों ने जो कि अग्रवाल थे। उन्होंने चबूतरा बनाया। तो उनका बंश नष्ट हो गया। येह बात मैंने सुणी है, कहाँतक सच्ची है– परमात्मा जानें। . (प्रश्न–) ठीक है? (श्रोता–) ठीक (है)। श्री स्वामी जी महाराज– ये संत– शाहपुरा के कहते हैं कि ठीक है (सही बात है)। (प्रवचनके अंशका यथावत-लेखन).


    (25 मिनट से) मेरे साथ ऐसा अन्याय किया है लोगों ने– छिपकर के चित्र उतारा है, बड़ा अपराध मानता हूँ (यह)। एक पाप होता है, एक अपराध होता है। पाप का डण्ड भोगणे से पाप शान्त हो जाता है, पण (परन्तु) अपराध शान्त नहीं होता। अपराध तो जिसका किया जाय, वो ही अगर क्षमा करे तो हो ज्याता है, नहीं तो बड़ा बज्रपाप होता है, डण्ड होता है। अपराध होता है वो। तो ऐसे मेरे साथ में अन्याय किया है लोगों ने। और उसका अनुमोदन किया है छिप- छिपकर के बहनों और भाइयों ने। तो (वो) बड़ा दोष मानता हूँ। वो ठीक नहीं है। अर (और) मेरे साथ ऐसा अन्याय करणा नीं (नहीं) चाहिये। उससे लाभ के बदले हानि की सम्भावना है। (प्रवचनके अंशका यथावत-लेखन).


    भक्त का अपराध भगवान् भी नहीं सहते। श्री स्वामी जी महाराज की पुस्तक ‘जित देखूँ तित तू’ में लिखा है कि–


    जिस तरह भक्तिमें कपट, छल आदि बाधक होते हैं, उसी तरह भागवत – अपराध भी बाधक होता है। भगवान् अपने प्रति किया गया अपराध तो सह सकते हैं, पर अपने भक्तके प्रति किया गया अपराध नहीं सह सकते। देवताओंने मन्थरामें मतिभ्रम पैदा करके भगवान् रामको सिंहासनपर नहीं बैठने दिया तो इसको भगवान् ने अपराध नहीं माना । परन्तु जब देवताओंने भरतजीको भगवान् रामसे न मिलने देनेका विचार किया, तब देवगुरु बृहस्पतिने उनको सावधान करते हुए कहा-

सुनु सुरेस रघुनाथ सुभाऊ। निज अपराध रिसाहिं न काऊ॥ 

जो अपराधु भगत कर करई। राम रोष पावक सो जरई।।

लोकहुँ बेद बिदित इतिहासा। यह महिमा जानहिं दुरबासा।।


(मानस, अयोध्या० २१८ २-३ )


    शंकरजी भगवान् रामके ‘स्वामी’ भी हैं, ‘दास’ भी हैं और ‘सखा’ भी हैं—‘सेवक स्वामि सखा सिय पी के’ (मानस, बाल० १५ । २) । इसलिये शंकरजीसे द्रोह करनेवालेके लिये भगवान् राम कहते हैं—

सिव द्रोही मम भगत कहावा । सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा ॥

संकर बिमुख भगति चह मोरी । सो नारकी मूढ़ मति थोरी ॥

संकरप्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास ।

ते नर करहिं कलप भरि घोर नरक महुँ बास ॥ (मानस, लंका० २।४, २)


    अतः साधकको इस भागवत अपराधसे बचना चाहिये।(‘जित देखूँ तित तू’, पृष्ठ २३,२४;)।


महापुरुषों ने चित्र के लिये मना किया है । इसलिये उनके चित्र का प्रचार न करें ।


    इस प्रकार यह समझ लेना चाहिये कि श्रीस्वामीजी महाराज ने जिस वस्तु को पूजा अथवा स्मृतिरूप में रखने के लिये मना किया है, वो न रखें। किसी वस्तु, स्थान, कमरा, स्टेज आदि को इस प्रकार महत्त्व न दें जिससे लोगों को स्मृतिरूप में रखने आदि की प्रेरणा मिले। दूसरे लोग ऐसी भूल करे तो उनको भी प्रेम से समझाने की कोशिश करें। 


('महापुरुषोंकी बातें और कहावतें' नामक पुस्तक से) 

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पता-
सत्संग-संतवाणी.
श्रध्देय स्वामीजी श्री
रामसुखदासजी महाराजका
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मंगलवार, 11 जून 2024

१.अपनी फोटोका निषेध क्यों है?(श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराज अपनी फोटोका निषेध करते थे)।

                       ।।:श्रीहरि:।।

अपनी फोटोका निषेध क्यों है?

(श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराज अपनी फोटोका निषेध करते थे)। 

(९) अपनी फोटोका निषेध

    आजकल कई लोग श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराज का नाम लिखा हुआ एक चित्र (चुपचाप) एक-दूसरेको मोबाइल आदि पर भेजने लग गये हैं। इसमें वे चश्मा लगाये हुए, दाहिने हाथके द्वारा पीछे सहारा लिये हुए और अपने एक (दाहिने) पैर पर दूसरा (बायाँ) पैर रखे हुए तथा घुटनेपर बायाँ हाथ धरे हुए दिखायी दे रहे हैं। उस चित्रके नीचे किसीने नाम लिख दिया कि ये 'रामसुखदास जी महाराज' हैं। लेकिन यह अनुचित है। श्री स्वामी जी महाराज अपने चित्र के लिये मना करते थे।

    ऐसे ही सेठजी श्री जयदयालजी गोयन्दका भी अपने चित्र-प्रचार के लिए मना करते थे। श्री सेठ जी ने एक प्रसिद्ध संत से कहा कि आप लोगोंको अपनी फोटो देते हो, इसमें आपका भला है या लोगोंका? सुनकर उनको चुप होना पड़ा, जवाब नहीं आया।

    कहते हैं कि एक बार किसी ने श्री सेठ जी से निवेदन किया कि हम आपका फोटो खींचना चाहते हैं। सुनकर श्री सेठ जी बोले कि पहले मेरे सिरपर जूती बाँध दो और फिर (सिरपर बँधी हुई जूती समेत फोटो) खींच लो। ऐसा जवाब सुनकर फोटो के लिये कहने वाले समझ गये कि इनको अपनी फोटो बिल्कुल पसन्द नहीं है। कोई फोटो लेता है तो इनको कितना बुरा लगता है।

    एक बार श्री स्वामी जी महाराज से किसीने पूछा कि लोगोंको आप अपना फोटो क्यों नहीं देते हैं? कई संत तो अपनी फोटो भक्तोंको देते हैं (और वे दर्शन, पूजन आदि करते हैं) आप भी अगर अपनी फोटो लोगोंको दें, तो लोगोंको लाभ हो जाय। जवाब में श्री स्वामी जी महाराज बोले कि हमलोग अगर अपनी फोटो देने लग जायेंगे तो भगवान् की फोटो बन्द हो जायेगी। (यह काम भगवद्विरोधी है)।

    एक बार किसीने श्री स्वामी जी महाराज को उनके गुरुजी– श्री कन्नीरामजी महाराजकी फोटो दिखायी। वो फोटो श्री स्वामी जी महाराज के बालक– अवस्था के समय की है। उसमें वे अपने गुरुजीके पास खड़े हैं, हाथ जोड़े हुए हैं। उस चित्रको देखकर महाराजजीने निषेध नहीं किया। इस घटनासे कई लोग उस चित्रके चित्रको अपने पासमें रखने लग गये और दूसरोंको भी देने लग गये (कि इस चित्रके लिये श्री स्वामी जी महाराजकी मनाही नहीं है)। उस चित्रके लिये श्री स्वामी जी महाराज ने शायद इसलिये मना नहीं किया कि वो फोटो गुरुजीकी है। इस चित्रके लिये श्री स्वामी जी महाराज ने न तो हाँ कहा और न ना कहा। इसलिये इस चित्रका दर्शन कोई किसीको करवाता है अथवा कोई करने को कहता है तो घाटे-नफेकी जिम्मेदारी स्वयं– उन्हीपर है।

एक दृष्टि से तो यह भी चित्र का प्रचार और उसके लिये प्रोत्साहन ही है। लोगों के मन में श्री स्वामी जी महाराज का चित्र देखने और दिखाने की ही आयेगी, जो कि उचित नहीं है। 

इसलिये अपना भला चाहनेवालों को श्री स्वामीजी महाराज का चित्र न तो अपने पास में रखना चाहिये और न दूसरों को रखने की प्रेरणा देनी चाहिये। दूसरा कोई ऐसा करे तो उसको भी मना करना चाहिये, समझाना चाहिये। 

    कई लोगोंके मनमें रहती है कि हमने श्री स्वामीजी महाराजके दर्शन नहीं किये। अब अगर उनका चित्र भी मिल जाय तो दर्शन करलें। ऐसे लोगोंके लिये तो सत्संगियोंके भी मनमें आ जाती है कि इनको चित्रके ही दर्शन करवादें। इनकी बड़ी लगन है। लेकिन यह उचित नहीं है। अगर उचित और आवश्यक होता तो श्री स्वामीजी महाराज ऐसे लोगोंके लिये व्यवस्था कर देते। चित्र-दर्शनके लिये व्यवस्था करना और करवाना तो दूर, ऐसा करनेवालोंको भी उन्होंने मना कर दिया।। इसलिये यह चित्र-दर्शन करवाना भी उचित नहीं है। अगर उचित या आवश्यक होता तो श्री स्वामी जी महाराज मना क्यों करते? क्या उस समय ऐसे भाववालों की चाहना नहीं थी?

    हमने तो सुना है कि जोधपुरमें किसी सत्संगी ने श्री स्वामी जी महाराज के कई चित्र बनवाकर कई लोगेंको दे दिये। तब श्री स्वामी जी महाराज ने लोगोंसे वे फोटो वापस मँगवाये और उन सब चित्रों को जलाया गया। इसका वर्णन 'विलक्षण संत-विलक्षण वाणी' नामक पुस्तकमें भी है। इसमें श्री स्वामी जी महाराज द्वारा अपनी फोटो-प्रचारके खिलाफ लिखाये गये पत्र भी दिये गये हैं और क्यों महाराजजी वृन्दावनसे जोधपुर पधारे तथा लोगोंको क्या-क्या कहा-इसका भी वर्णन है।

    इस पुस्तकमें 'परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराज' का जोधपुरमें किये गये 'चित्र-प्रचारका दुख' भी बताया गया है। उसमें यह भी बताया गया है कि यह चित्र- प्रचार नरकोंमें जाने का रास्ता है। श्री स्वामी जी महाराज ने अपनी वसीयतमें भी चित्रका निषेध किया है। निषेध काम को करने से वंश नष्ट हो गया– यह आगेवाले प्रसंग में देखें–

(१०) निषेध (वर्जित) कामको करने से भारी नुकसान, घटना

    श्री स्वामी जी महाराज बताते हैं कि महापुरुषोंके कहनेके अनुसार जो नहीं करता है, तो (आज्ञा न माननेसे) वो उस लाभसे वञ्चित रहता है (दण्डका भागी नहीं होता) परन्तु जिसके लिये महापुरुषोंने निषेध किया है, मना किया है, उस आज्ञाको कोई नहीं मानता है तो उसको दण्ड होता है।

    श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज की पुरानी वसीयत (22 जनवरी 1980_8:30 बजे) की ओडियो रिकॉर्डिंग है। उसमें श्री स्वामी जी महाराज कहते हैं कि– (23 मिनट से) ... वही बात आपलोगों से कहता हूँ क आप भी उन संत- महात्माओं की आज्ञा के अनुसार जीवन बनावें, तो इससे लाभ जरूर होगा– इसमें मेरे सन्देह नहीं है। मैंने कई बातें सुणी है, जैसे– शाहपुरा के मुरलीराम जी महाराज थे। हरिपुर में जो थाम्बा है। उन्होंने ऐसा कह दिया कि मेरे पीछे स्मारक और (आदि) मत बणाणा। तो वहाँ के गृहस्थों ने जो कि अग्रवाल थे। उन्होंने चबूतरा बनाया। तो उनका बंश नष्ट हो गया। येह बात मैंने सुणी है, कहाँतक सच्ची है– परमात्मा जानें। . (प्रश्न–) ठीक है? (श्रोता–) ठीक (है)। श्री स्वामी जी महाराज– ये संत– शाहपुरा के कहते हैं कि ठीक है (सही बात है)। (प्रवचनके अंशका यथावत-लेखन).

    (25 मिनट से) मेरे साथ ऐसा अन्याय किया है लोगों ने– छिपकर के चित्र उतारा है, बड़ा अपराध मानता हूँ (यह)। एक पाप होता है, एक अपराध होता है। पाप का डण्ड भोगणे से पाप शान्त हो जाता है, पण (परन्तु) अपराध शान्त नहीं होता। अपराध तो जिसका किया जाय, वो ही अगर क्षमा करे तो हो ज्याता है, नहीं तो बड़ा बज्रपाप होता है, डण्ड होता है। अपराध होता है वो। तो ऐसे मेरे साथ में अन्याय किया है लोगों ने। और उसका अनुमोदन किया है छिप- छिपकर के बहनों और भाइयों ने। तो (वो) बड़ा दोष मानता हूँ। वो ठीक नहीं है। अर (और) मेरे साथ ऐसा अन्याय करणा नीं (नहीं) चाहिये। उससे लाभ के बदले हानि की सम्भावना है। (प्रवचनके अंशका यथावत-लेखन).

    भक्त का अपराध भगवान् भी नहीं सहते। श्री स्वामी जी महाराज की पुस्तक ‘जित देखूँ तित तू’ में लिखा है कि–

    जिस तरह भक्तिमें कपट, छल आदि बाधक होते हैं, उसी तरह भागवत – अपराध भी बाधक होता है। भगवान् अपने प्रति किया गया अपराध तो सह सकते हैं, पर अपने भक्तके प्रति किया गया अपराध नहीं सह सकते। देवताओंने मन्थरामें मतिभ्रम पैदा करके भगवान् रामको सिंहासनपर नहीं बैठने दिया तो इसको भगवान् ने अपराध नहीं माना । परन्तु जब देवताओंने भरतजीको भगवान् रामसे न मिलने देनेका विचार किया, तब देवगुरु बृहस्पतिने उनको सावधान करते हुए कहा-

सुनु सुरेस रघुनाथ सुभाऊ। निज अपराध रिसाहिं न काऊ॥ 

जो अपराधु भगत कर करई। राम रोष पावक सो जरई।।

लोकहुँ बेद बिदित इतिहासा। यह महिमा जानहिं दुरबासा।।

(मानस, अयोध्या० २१८ २-३ )

    शंकरजी भगवान् रामके ‘स्वामी’ भी हैं, ‘दास’ भी हैं और ‘सखा’ भी हैं—‘सेवक स्वामि सखा सिय पी के’ (मानस, बाल० १५ । २) । इसलिये शंकरजीसे द्रोह करनेवालेके लिये भगवान् राम कहते हैं—

सिव द्रोही मम भगत कहावा । सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा ॥

संकर बिमुख भगति चह मोरी । सो नारकी मूढ़ मति थोरी ॥

संकरप्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास ।

ते नर करहिं कलप भरि घोर नरक महुँ बास ॥ (मानस, लंका० २।४, २)

    अतः साधकको इस भागवत अपराधसे बचना चाहिये।(‘जित देखूँ तित तू’, पृष्ठ २३,२४;)।

महापुरुषों ने चित्र के लिये मना किया है । इसलिये उनके चित्र का प्रचार न करें ।

    इस प्रकार यह समझ लेना चाहिये कि श्रीस्वामीजी महाराज ने जिस वस्तु को पूजा अथवा स्मृतिरूप में रखने के लिये मना किया है, वो न रखें। किसी वस्तु, स्थान, कमरा, स्टेज आदि को इस प्रकार महत्त्व न दें जिससे लोगों को स्मृतिरूप में रखने आदि की प्रेरणा मिले। दूसरे लोग ऐसी भूल करे तो उनको भी प्रेम से समझाने की कोशिश करें। 

('महापुरुषोंकी बातें और कहावतें' नामक पुस्तक से)

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पता-
सत्संग-संतवाणी.
श्रद्धेय स्वामीजी श्री
रामसुखदासजी महाराजका
साहित्य पढें और उनकी वाणी सुनें।
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सोमवार, 3 अप्रैल 2023

श्री स्वामीजी महाराज की यथावत् वाणी [श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराजके ज्यों के त्यों लिखेहुए प्रवचन]

                  ।।श्रीहरिः।। 

         श्री स्वामीजी महाराज 
                      की
               यथावत् वाणी 
 [श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराजके ज्यों के त्यों लिखेहुए प्रवचन]
               नम्र निवेदन
   श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदास जी महाराज के दिनांक 13 जून 1990, प्रातः पाँच बजे और साढ़े आठ बजेवाला प्रवचन मेरे को बहुत बढ़िया लगा। इनके सिवाय दिनांक 20 अगस्त 1994_0518 (पाँच बजे) वाला प्रवचन भी मेरे को बहुत बढ़िया लगा। मन में आया कि इन प्रवचनों को तो ज्यों के त्यों लिखना चाहिये। इसलिये ये प्रवचन पूरे और यथावत(ज्यों के त्यों) लिखे गये। इनके अलावा श्रीस्वामीजी महाराज के जिन- जिन प्रवचनों में मेरे को विशेष और नयी बातें मिली तथा आवश्यक लगी, उनको भी यथावत् लिखा गया है और इस पुस्तक में 
जोङा गया है। इसी प्रकार कुछ प्रवचन और भी लिखे गये। 
    मैंने इनमें यथावत्- रूप से, सत्य- सत्य और ईमानदारी पूर्वक लिखनेकी कोशिश की है। परमात्मतत्त्व का अनुभव चाहने वाले और महापुरुषों की वाणी को यथावत समझने की इच्छा रखनेवालों के लिये ज्यों का त्यों लिखा हुआ प्रवचन बहुत उपयोगी रहता है। यह (यथावत्- लेखन) रिकोर्ड किये हुए प्रवचन और लिखे हुए प्रवचन– दोनों की पूर्ति करता है। इससे यथार्थता समझने में बहुत बङी सहायता मिलती है; क्योंकि इसमें जैसे- जैसे श्रीस्वामीजी महाराज बोले हैं, वैसे के वैसे ही लिखा गया है, कुछ काँट- छाँट नहीं की गयी है, न वाक्य और शब्द बदले गये हैं तथा न कोई आवश्यक अंश हटाया गया है। जहाँ खुलासा करना आवश्यक लगा, वहाँ वो कोष्ठक में लिख दिया। महापुरुषोंकी "मूलवाणी" और उनके भावों की रक्षा की गयी है। 
   "श्री स्वामी जी महाराज की यथावत वाणी" नामक पुस्तक जो पहले छपी थी, उसके यथावत-लेखनवाले प्रवचन इसमें सम्मिलित कर लिये गये हैं। उनमें कुछ संशोधन करके उनको अधिक उपयोगी बनाया गया है। 
   सत्संग प्रवचन करते समय जैसे- जैसे श्री स्वामीजी महाराज बोले हैं , वैसा का वैसा ही लिखने की कोशिश की गयी है अर्थात् इसमें यह ध्यान रखा गया है कि जो वाणी वो महापुरुष बोले हैं, उसको वैसे के वैसे ही लिखा जाय। अपनी होशियारी न लगाई जाय। उनके द्वारा बोले गये शब्द और वाक्य आदि बदलें नहीं और उस वाणी के कोई वाक्य और शब्द आदि छूटे भी नहीं। जैसे वो बोले हैं वैसे- के- वैसे ही लिखे जायँ। 
   महापुरुषों द्वारा बोली गयी प्रामाणिक, आप्तवाणी को लिखने में ईमानदारी पूर्वक सत्यता का ध्यान रखना चाहिये। जैसे- जैसे वो बोले हैं, वैसे के वैसे ही लिखना चाहिये। कुछ फेर- बदल नहीं करना चाहिये। इस लेखन में ऐसा ही प्रयास किया गया है। इससे यह वाणी अत्यन्त विश्वसनीय और उपयोगी हो गयी है तथा समझने में और भी सुगम हो गयी है।
  इसमें प्रवचनके प्रत्येक मिनिटवाली सामग्री की संख्या भी लिखी है। इससे यह प्रामाणिकता के साथ- साथ एक क्रान्तिकारी पुस्तक हो गई है। श्री स्वामी जी महाराज के प्रवचनों को ज्यों के त्यों लिखकर बनायी हुई, इस तरह की यह पहली पुस्तक समझनी चाहिये। 
   जहाँ मारवाड़ी भाषा आदि के कुछ कठिन शब्द और वाक्य आदि आये हैं, उनके भाव और अर्थ कोष्ठक (ब्रैकेट) में दिये गये हैं। कहीं- कहीं विषय को सरल बनाने के लिये भी कोष्ठक का उपयोग किया गया है। 
  श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज के समय में रिकोर्ड किये गये उनके प्रवचन लिखे जाते थे। वो इसलिये कि उनको पुस्तकों में छपवाया जाय। वर्तमान में सब न भी छपे तो भविष्य में छापे जायँ। ऐसी अनेक वर्षों की हस्तलिखित प्रवचनों की कोपियाँ पङी हुई है। वो अभी क्रियान्वित नहीं हो पा रही है। रिकोर्डिंग वाणी को लिखनेवाले सज्जनों में से किसीने श्री स्वामी जी महाराज से कहा कि महाराजजी! आपका हर एक प्रवचन लिखना जरूरी है क्या? पहले लिखे हुए प्रवचनों के बहुत से रजिस्टर पङे हैं, वो छापे नहीं जा रहे हैं। उनकी पुस्तकें नहीं बन रही है। इसलिये लिखने का उत्साह कम हो जाता है। तब श्री स्वामी जी महाराज ने कहा कि प्रतिदिन प्रातः पाँच बजेवाली सत्संग के तो हरेक प्रवचन लिख लिया करो और दिनवाले प्रवचनों में जो विशेष लगे, उनको लिख लिया करो। इससे यह समझ में आया कि श्री स्वामी जी महाराज ने लोगोंकी परेशानी और अभाव देखकर, संकोच के कारण ऐसा कहा है। महापुरुषोंके तो हरेक प्रवचन लिखने योग्य हैं। 
   इस प्रकार रिकोर्डिंग की कैसेटों द्वारा अनेक प्रवचन लिखे गये और बहुतसे लिखने बाकी रह गये। कई प्रवचनों के लेख पुस्तक रूप में छपे हैं; लेकिन वो यथावत् नहीं रहे। जैसे, उनमें संशोधन के नामपर जगह-जगह वाणी को बदला गया है। वाक्यों की भाषा बदली गई है। बीच-बीच में वाणी के अंश काटकर छोङ भी दिये हैं। कई प्रवचन तो लेखक ने पूरे ही अपने ढंग से लिखे हैं और छोटे कर दिये हैं तथा सारांशरूप में लिखे हैं। इस प्रकार रिकोर्डिंग वाणी के लेखोंमें यथावत्ताकी कमी रही– ऐसा लगता है। लेखन में असलियत न रहनेसे उसका प्रभाव कम हो जा जाता है। पढनेवालेपर महापुरुषोंकी वाणीका जैसा असर पङना चाहिये, वैसा नहीं पङता। यथावत् लेख बनाकर तैयार करने में बहुत परिश्रम करना पङता है। अगर कोई परिश्रम करके श्री स्वामी जी महाराज की वाणी को यथावत् छपवावे तो स्वयं को और दुनियाँ को बङा भारी लाभ हो। 
   श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदास जी महाराज के जब हम 'ओडियो रिकोर्डिंग वाले' प्रवचन सुनते हैं तो उनमें कई बातें बहुत बढ़िया लगती है और मन करता है कि बार-बार सुनें। बाद में भी जब कभी दुबारा उस बात को सुनने का मन होता है और प्रवचन सुनना शुरु करते हैं तो उस बात को खोजने में समय लगता है। वो बात अगर अलग से लिखी हुई होती है तो सुगमता से मिल जाती है और सुनकर भी समझ ली जाती है। लिखी हुई बात को बार-बार पढ़कर उस पर विचार करना भी सुगम हो जाता है।
   कभी-कभी विचार आता है कि इस बात को श्रीस्वामीजी महाराज बोले तो ऐसे ही हैं न? बोली हुई और इस लिखी हुई बात में कोई फर्क तो नहीं है? कई बार लिखने में भूल भी हो जाती है और कभी-कभी लिखनेवाला अपनी चतुराई लगाकर वाक्य को बदल भी देता है। लेकिन ऐसे लेखन पर श्रद्धा नहीं बैठती। पता नहीं लगता कि श्रीस्वामीजी महाराज का वास्तव में यहाँ कहने का भाव क्या था।
   कई बार 'लेखन' और 'आडियो रिकार्डिंग' का मिलान करते हैं तो जैसा श्रीस्वामीजी महाराज बोले हैं, वैसा नहीं मिलता, अन्तर (फर्क) मिलता है। श्रीस्वामीजी महाराज जैसा वाक्य बोले हैं, वैसा लिखा हुआ नहीं मिलता, वाक्य बदला हुआ मिलता है।
   कभी-कभी तो वो लेखक बिना बताये, पूरे अंश या वाक्य को ही छोड़ देता है और आगे बढ़ जाता है।
   तो ऐसे में विश्वास नहीं होता कि यह लेखन यथावत् है या नहीं। इससे वास्तविक बात का पता लगाना मुश्किल हो जाता है। श्रीस्वामीजी महाराज की बात का रहस्य छूट जाता है। वो रहस्य तब समझ में आता है कि जब रिकोर्डिंग वाणी के अनुसार ही– ज्यों का त्यों "वाक्य" लिखा हुआ हो, उसमें एक शब्द और मात्रा आदि का भी फर्क न किया गया हो। 
   उससे भी बढ़िया तब समझ में आता है कि उस रिकोर्डिंग को ही ध्यान से सुना जाय। ऐसे सुनकर समझा जाय तो बात बहुत बढ़िया समझ में आती है। बहुत लाभ होता है। 
   कभी-कभी सुनने की सुविधा न हो तो लिखी हुई बात को पढ़कर भी समझा जा सकता है। परन्तु लिखी हुई बात वैसी- की वैसी ही होनी चाहिये जैसी कि श्रीस्वामीजी महाराज बोले हैं। लिखने में बदलाव नहीं होना चाहिये। रिकोर्डिंग वाणी के अनुसार ही, यथावत् लेखन होना चाहिये।
   यथावत् लेखन में जितनी कमी रहेगी, उतनी ही अथवा उससे भी अधिक समझने में कमी रहेगी। बात को यथावत् समझना हो तो लेखन भी यथावत् होना चाहिये। 
  इस पुस्तक में कुछ ऐसा ही प्रयास किया गया है। 
  सत्संग की बढ़िया और मार्मिक बातों को "यथावत्" समझने के लिये, प्रवचनों के अंशों को अलग से भी "यथावत्" लिखा गया है।
   किस प्रवचन में, कौन-सी बात, कहाँपर आयी है- इसका सुगमता से पता लग जाय, इसके लिये प्रवचन के मिनिटों की संख्या भी दी गई है। 
   थोङे समय में ही अधिक बातें समझ में आ जाय, सुगमता से उधर दृष्टि चली जाय, पढ़ने और समझने में सुगमता हो जाय- इसके लिये उन बातों के शीर्षक भी दिये हैं। 
   इसलिये यथावत्- लेखन प्रवचनों को और यथावत्- लेखन अंशों को ध्यानपूर्वक पढ़ना चाहिये। 
   सभी सत्संगी सज्जनों से नम्र निवेदन है कि ऐसे महापुरुषों के प्रवचनों को इसी प्रकार ईमानदारी पूर्वक यथावत् लिखकर या लिखवाकर और भी पुस्तकें छपवावें और दुनियाँ का भला करें। इससे अपना भी बङा भारी भला होगा। वास्तविक हित होगा।  
   जब भगवान् की बङी भारी कृपा होती है तब महापुरुषों की हू-ब-हू, ज्योंकी त्यों, यथावत वाणी मिलती है। इससे बङा भारी लाभ होता है ।
    भाई बहनों को चाहिये कि इससे स्वयं लाभ लें और दूसरों को भी बतावें। यथावत-लेखन यद्यपि मेहनत का काम है। ऐसा परिश्रम करनेकी हिम्मत हरेक नहीं करता और करता है तो बहुत बङा लाभ होता है। 
    यह पुस्तक भी कई सज्जनों की मेहनत से तैयार हुई है। जैसे, मेघसिंह जी चौहान (गाँव नेणाऊ, जिला नागौर ने अन्तिम प्रवचन लिखकर मेरेको श्री स्वामी जी महाराज की वाणीको यथावत लिखनेकी प्रेरणा की [इन्होंने ही "गीतासेवा" ऐप्प बनवानेका कार्य किया और श्री सेठजी, भाईजी और श्री स्वामी जी महाराजकी पुस्तकें तथा ओडियो रिकोर्डिंग वाणीको ऑनलाइन उपलब्ध करवाया है।)। गजेन्द्र सिंह राणावत (काँणोली, भीलवाङा) ने यन्त्र के द्वारा सँवारकर इसको पुस्तक रूप में तैयार किया, उनकी बहन प्रियाकुँअर राणावत द्वारा लिखे हुए (दिनांक १७|०७|१९९७_प्रातः ५ बजे सीकरवाले) प्रवचन से इसमें सहायता मिली, महावीर सिंह राठौङ (दीपपुरा, कुचामन) ने (दिनांक १३|६|१९९०_ प्रातः ५ और ८:३० बजेवाले प्रवचन के) लेखन की सहायता की और गुलाब सिंह जी शेखावत (खोरी,सीकर) ने प्रेरणा और कोशिश करके इस पुस्तक को छपवाया। इसी प्रकार मेरे बङेभ्राता खुमानसिंह राठौङ (चावण्डिया, नागौर) आदि तथा और भी ज्ञात- अज्ञात, कई सज्जनों और माता- बहनों की सद्भावना इस पुस्तक में है। जो महापुरुषों की वाणी को दुनियाँ तक पहुँचाने में सहायक हुए, वे सभी धन्यवाद के पात्र हैं और अब,आगे वे सज्जन भी धन्यवाद के पात्र होंगे जो स्वयं पढेंगे तथा महापुरुषों की इस वाणी को जन-जन तक पहुँचायेंगे। 
    इस पुस्तक में जो अच्छाई है, वो उन महापुरुषों की है और जो त्रुटियाँ है, वो मेरी व्यक्तिगत हैं। सज्जन लोग त्रुटियों की तरफ ध्यान न देकर अच्छाई की तरफ ध्यान देंगे, ऐसी आशा है।
निवेदक-
डुँगरदास राम 
  चैत्र शुक्ला १२ सोमवार, संमत २०८०। भीलवाङा (राजस्थान)। 
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गुरुवार, 16 फ़रवरी 2023

बुराई रहित होना- बङी भारी सेवा (श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराज)।

 

।।श्रीहरि:।।

 बुराई रहित होनाबङी भारी सेवा।

19970717_0518_Buraai ka tyag (बुराई का त्याग)

(श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराज)

{दिनांक १७|०७|१९९७_प्रातः बजे, सीकर चातुर्मास वाले प्रवचन का यथावत् लेखन-}


(••• 0 मिनिट से) नारायण नारायण नारायण नारायण

राम राम राम राम (1 मिनिटसे) राम राम  राम राम राम

नारायण नारायण

   संसार की सेवा करो, चाहे अपणे (अपने) को जान लो, अथवा भगवान के हो ज्याओ, ये तीन बात है खास। उसमें संसार की सेवा करणे में हमलोगों ने प्रायः यह समझ रखा है कि उनको सुख पहुँचाना,उनसे, शरीर से सेवा करणा,उनको चीज बस्तु (वस्तु) देणा,ऐसे सेवा हो गई, परन्तु ये संतों की बात मैंने एक पढ़ी है,वो सेवा भोत (बहुत) सोरी सेवा है- सुगम सेवा है,अर (2 मिनिटसे) भोत बड़ी सेवा है,खास बड़ी सेवा हैकिसी को भी बुरा समझना,कैसा ही वो हमारा अहित करणेवाला हो, कैसा ही बुरा आचरण करनेवाला हो, किसीसे, कैसा ही विपरीत चलनेवाला हो, तो "वो बुरा है"- ऐसा नहीं समझना, "बुरा है" ऐसा नहीं समझना,क्यों? (क्योंकि) सर्वथा कोई बुरा हो सकता ही नहीं,आंशिक बुराई भलाई रहती है, सर्वथा बुरा कोई हो नहीं सकता क्योंकि मूल में साक्षात परमात्मा का अंश है,[वो] बुरा है नहीं। वो सबके लिए बुरा नहीं हुआ तब अपणे लिए बुरा थोड़े ही होता है। अपणे लिये बुरा होता है?— अपणे, माँ के लिये, पिता के लिये,अपणे स्त्री, पुत्र के लिये, अपणे सम्बन्धियों के लिये। सबके लिये बुरा हो नहीं सकता। (3 मिनिटसे) सब समय में बुरा हो नहीं सकता, सब देश,सब काल में, सब वस्तुओं में, सम्पूर्ण परिस्थितियों में बुरा नहीं हो सकता, तो "वो बुरा है" ये मानना गळत है।

   सज्जनों! बड़ी मार्मिक बात है, बढ़िया बात है, खूब विचार करो, ना दूसरे किसी को बुरा समझना, अपणे में भी बुरा हूँ, "मैं बुरा हूँ"- ये मानणा (मानना) अपणा (स्वरूप) भी बुरा हो नहीं सकता, अपणे में भी परमात्मा का अंश है। अपणे ('अपन सबलोगों का स्वरूप' भी) बुरा नहीं हो सकता अपणे को बुरा समझना भी बड़ा भारी दोष है। अपणे (अपने) साथ अपणा अन्याय करना है,अपणे साथ अपनी घात करना हैअपणे को भी बुरा समझना। अपने में बुराई ज्याती है, (4 मिनिटसे) अपने बुरे हैं नहीं,[बुराई] जाती है, तो उसमें सावधान रहना है। पण (पर) अपने को बुरा नहीं समझना है। कहते हैं [कि] हमने तो सुना है-

पापोऽहं पापकर्माहं पापात्मा पापसम्भवः।

(त्राहि मां पापिनं घोरं सर्वपापहरो हरिः।।)

भगवान के सामने जाकर कहता है कि महाराज! मैं पापी हूँ, पापात्मा हूँ, पाप से ही पैदा हुआ हूँऐसा। तो ये जो भगवान् के सामने कहना है इसका तात्पर्य है कि मेरे में ये दोष आये हैं। वे आपकी कृपा से नष्ट हो ज्याये। जैसे कोई आग में चीज रखता है तो आग जला देती है सबको ही, ऐसे भगवान के सामने कहणा है, वो पापी होणा (होना) नहीं है, किन्तु निष्पाप होणे के लिये कहता है। "मैं पापी हूँ" इस बात के लिये नहीं कहता है- मैं पापी हूँ। बात [यह है कि] महाराज! ये पाप मेरा मिट ज्याय। जैसे प्रकाश के सामने (5 मिनिटसे) कोई अँधेरा रखे तो अँधेरा टिकेगा नहीं, प्रकाश हो ज्यायगा, तो अपणे में कुछ भी कोई बुराई- खराबी आई है, भगवान के सामने जाते ही सब मिट ज्यायगी। उसको (उसका) वास्तव में शुद्ध होणे का तात्पर्य है, अपणे को "पापी मानणा" - तात्पर्य बिलकुल नहीं है। तो मैं दोषी हूँ, मैं बुरा हूँ, मैं खराब हूँ, ऐसा कायम नहीं करणा। बुराई गई, तो अब सावधान रहणा है। अब नहीं आणी चाहिये। कोई भी कसूर हो ज्याय, अब नहीं करणा चाहिये।

   जैसे बालक कोई गलती करता है, माँ धमकाती है, माँ माँ अब नहीं करूँगा [गलती अब] नहीं करूँगा। तो फेर (फिर) माँ नहीं मारती। मानो आगन्तुक होती है [बुराई], खूब गहरी रीति से आप हम विचार करें, बुराई सदा ही रहती नहीं, सदा रह सकती नहीं। सबके लिये रह सकती नहीं, सब समय में रह (6 मि॰) सकती नहीं, सब समय में, सब समय में कैसे रहती है बुराई, रह ही नहीं सकती। मूल में परमात्मा ही परमात्मा है, तो बुराई है नहीं, तो हमारे (में) बुराई नहीं है। ना कोई और बुरा है, मैं बुरा हूँ, बुराई है ही नहीं। दूजे को बुरा समझना और अपणे को भी बुरा समझणा। अपणे को बुरा समझने के समान अपणे साथ में अन्याय कोई है ही नहीं। ऐसे दूसरों को बुरा समझना है, दूसरों के साथ भी बड़ा भारी घातक काम करणा है। इस वास्ते अपणे को (भी) बुरा समझेएक बात। और बुरा चाहें भी नहीं, किसी का भी बुरा नहीं [चाहें] –

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुखभाग्भवेत्।।

किसी को बुरा समझे। तो बुरा समझे नहीं (7) और बुरा चाहे नहीं कि किसी का बुरा हो ज्याय, किसी का अच्छा हो ज्याय [आदि] किसी का बुरा चाहणा- ये भोत बड़ी भारी पाप की बात है। किसी का भी बुरा नहीं चाहणा चाहिये और किसी की बुराई करणा नीं (नहीं) चाहिये। ये तीन बात है। और बुराई बोलेंगे नहीं, बुराई सुणेंगे नहीं- पाँच हो ज्याय तो भोत बढ़िया। तीन, तीन ही काफी है। किसी को बुरा मानें, किसी का बुरा चाहें और किसी का बुरा करें, अगर ये ब्रत(व्रत) ले लिया जाये, नियम कर लिया जाय तो बड़ी भारी उन्नति हो ज्यायेगी, बड़ी साधना सिद्ध हो ज्यायेगी और इसमें ऐसी बात है (कि) किसी को बुरा समझणे से, किसी का बुरा चाहणे से, किसी का बुरा करणे से कोई खर्च हो ज्याय, ये खर्च नहीं होगा कुछ भी। पैसा खर्च होगा नहीं। इसमें परिश्रम भी करना नहीं पड़ेगा। (8)

   तो किसी का (किसीको) बुरा है- ये नहीं कायम करणा है, बुरा चाहणा, बुरा करणा है। अब क्या बात रही? कह, हमारी नियत बुरी नहीं है किसी के प्रति। तो ये बुराईपणे का सम्बन्ध ही अपणे छोड़ देणा है। जहाँ बुराई का सम्बन्ध छोड़ा, स्वतः ही भलाई है- स्वाभाविक ही। ये जो खराबी है वो आती है और भलाई तो सब, स्वतः - परमात्मा है (बुराई तो आती जाती है, भलाई आती जाती नहीं है, वो तो स्वतः है और वो परमात्मस्वरूप है, भलाई हरदम रहती है) तो अब इतनी ही बात रह गई, अब इसको सुरक्षित रखणा है। तो आज से मैं किसी को बुरा नहीं समझूँगा अब बात क्या बाकी रही? एक बात बाकी रही। ये बुराई ज्याय- ये कायम रहे, सदा ही, भलाई कायम रहे, ये सदा (9) मौजूद रहे। भाई-बहन कहते हैं कि सत्संग में रहते हैं तब तो हमारे को ये ठीक रहती है फेर वैसी वृत्ति नहीं रहती। तो ये बुरा किसी को (भी) मानूँ, किसी का बुरा चाहूँ, किसी का बुरा करूँ- ये बात हमारी, हरदम कायम कैसे रहे? तो कायम रहणे का उपाय है [यह] पक्का विचार कर लिया अभी (अब) मैं अपने को [और] दूजे- किसी को बुरा नहीं मानूँगा। बुरा करूँगा नहीं, किसी का बुरा नीं (नहीं) चाहूँगा। बुराई करूँगा ही नहीं। बुराई के साथ सम्बन्ध ही छोड़ दिया हमने। तो अपणे को बुरा समझना, दूसरे को। ये बात याद रखो। अपने को, दूसरे को, बुरा नहीं समझूँगा- ये एक बात याद करलो। तो बुरा चाहणा और बुरा करणा [- ये दो] आपसे आप मिट ज्यायेगा। ना मैं बुरा हूँ ये समझे, (10) ना दूजा बुरा है ये [समझे। ये] समझे। ये कायम रखें, तो ये तीनों बातें ज्यायगी आप से आप ही। इसकी रक्षा रखणा है।

    इसमें एक बड़ी भारी विचित्र बात है। वो क्या है कि सबका भला होता है इसमें। सभी- सब का भला हो ज्याता है- बुराई छोड़ देणे से। अहिंसा प्रतिष्ठियां तत्सन्निधौ वैरत्यागः (योगदर्शन २।३५) जिसके ये अहिंसा है, इसकी प्रतिष्ठा हो ज्यायगी तो उसके पास में दूजे आदमी बैर नहीं करेंगे। इतना भलापणा होगा [कि] उसके पास में बैर छूट ज्यायगा। जैसे सिंघ बकरी साथ चरे, हरिण और सिंघ साथ में रहणे लग ज्याय। इतना प्रभाव पड़ेगा। सर्वथा, ये हमारे में प्रतिष्ठित हो ज्यायपक्की हो ज्याय अपणे में। पहली- पुराणी रही है, उसका संस्कार भी सर्वथा मिट ज्याय। कोई बुरा है अर किसी का बुरा चाहूँ (11) [ये नहीं रहे] अर किसी का बुरा नहीं करूँगा- ये दृढ़ होणे के बाद, पक्की होणे के बाद आपके पास में रहते हुए (आपके पासमें रहनेसे ही), दूसरे आदमी आपस में लड़ेंगे नहीं, दूसरे जन्तु लड़ेंगे नहीं। दूसरों को शान्ति हो ज्यायगी और संसार की बड़ी भारी सेवा हो ज्यायगी। सेवा करणे से सेवा होती है सीमित और बुराई करणे से, किसी को दुख देणे से, किसी का अनिष्ट करणे से सेवा होती है असली (असीम) असली चीज है ये। अभी-अभी चातुर्मास ब्रत है, उसमें ये ब्रत ले लिया जाय कि भई! अभी इस चातुर्मास में हमने ये बात सीख ली। कभी कोई मन में बुरी ज्याय तो राम राम राम राम राम कर देणा,अर माफी माँग लेणा मन ही मन से। और भगवान को याद करो- हे नाथ! हे नाथ!! भूल गए, भूल गए, नाथ! भूल गए, भूल हो गई।  क्षमा करो नाथ! हमारे को। ऐसे माँग लेणा भगवान से। वो बुराई टिकेगी नहीं, वो ठहरेगी नहीं। (12)  

   तो बुराई मूल में है नहीं, बुराई आगन्तुक होती है। इस वास्ते हम किसी को बुरा नहीं समझेंगे, किसी का बुरा नहीं चाहेंगे, किसी का बुरा करेंगे नहीं। चाहेंगे नहीं, बुरा करेंगे भी नहीं। वो भलाई स्वतः हो गई, स्वतः जो चीज होती है , वो नित्य होती है, की हुई चीज है वो अनित्य होती है, की हुई चीज बणावटी (बनावटी) होती है अर स्वतः होती वो असली होती है। हम भगवान का भजन करते हैं, ये बणावटी है और स्वतः भगवान की याद आती है हमारे, बिना भगवान के हम रेह (रह) ही नहीं सकते, स्वतः आई याद है, वो असली भजन होता है। भगवान का भजन करते हैं (और) संसार की बात याद आती है, याद आती है वो असली होती है अर करते हैं वो नकली होती है। तो बुराई नहीं करेंगे तो भलाई भीतर से स्वतः पैदा होगी, स्वाभाविक होगी अर स्वाभाविक ही होगी, नित्य होगी। (13) वो सदा के लिये होगी अर सबके लिये हो ज्यायगी, नित्य हो जायगी। बुराई छोडणे (छोङने) से [भलाई] स्वतः ही हो ज्यायगी। जैसे घर में झाड़ू देणे से मकान साफ हो ज्याता है। साफ कूड़ा करकट निकाल दो, उसमें खराबी- खराबी निकाल दो, फिर साफ करणा नहीं पड़ता। वो खराब निकाल दो, खराब कूड़ा करकट निकालने पर तो सफा साफ हो ज्यासी (जायेगा), सफाई हो ज्यायगी, साफ हो ज्यायगा। तो सब जगह परमात्मतत्त्व स्वतः परिपूर्ण है। बुराई छोड़णे से भलाई आप से आप होती है।

   भलाई करणे में उद्योग करणा पड़ता है, खर्च करणा पड़ता है, परिश्रम करणा पड़ता है और बुराई करणे में कोई खर्च नहीं करणा पड़ता अर कोई उद्योग करणा नहीं पड़ता- कोई परिश्रम करणा नहीं पड़ता। कुछ, उसको जोर आता ही नहीं। इस ब्रत में, इस नियम में, इस बगत (समय) अपणे ये बात एक कर लें। कहीं कोई बुराई हो ज्याय (14) तो हाथ जोड़कर माफी माँग ले,भई! मेरी ये भूल हो गई, मेरी गलती हो गई माफ करणा ,राम राम राम राम, वो चली ज्यायगी- भगवान् को याद करते ही चली ज्यायगी। माफी माँगते ही सब दोष दूर हो ज्यायेंगे एकदम। माफी माँगणे का भी अर्थ यही है कि मैंने गलती करदी,अब गलती नहीं करूँगा। नहीं करूँगा, माफी माँगली [और] फेर गलती करे तो माफी कहाँ माँगी। अपने बुराई नहीं करणा है बुरा चाहणा है बुरा मानणा है।

   सज्जनों! सदा के लिये फिर आप मस्त हो ज्याओगे और आपके द्वारा संसारमात्र की सेवा होगी। करणे से तो थोड़ी [होगी], सैकडों, हजारों, लाखों, करोड़ों, अरबों रुपया लगाणे पर भी भलाई होती है सीमित (थोङी) और किसी का बुरा करणे से भलाई होती है असीम, स्वाभाविक। किसी को बुरा समझेंगे तो बुराई सदा के लिए [मिट जाती है-] बुराई का खाता ही (15) अपणे से मिट ज्याता है। तो ये भलाई असीम होती है, नित्य होती है, निर्विकार होती है, सदा। तो ये सिद्धान्त है अर बड़ा सुगम है अर बड़ा व्यापक है अर बड़ा ठोस है अर बड़ी सच्ची बात है। [इससे] कल्याण हो ज्यायेगा, उद्धार हो ज्यायेगा और अपणा कल्याण होता है तो एक बात दूजी और भी है, पण ये बात है, इसमें, इसमें सब पेट में ज्याती है (इस एक बात में सब बातें जाती है) इतनी विलक्षण बात है।

    बुरा करणे से क्या होता है भलाई के साथ हमारा सम्बन्ध हो ज्याता है। भलाई करणे से भलाई की हुई होती है अर की हुई आदि और अन्त वाली होती है। भलाई के साथ सम्बन्ध होता है वो निरन्तर नीं रहता, भलाई करते हैं इतना (इतने समय) भलाई रहेगी, ( उस दूजे समय में नहीं रहता अर्थात भलाई के समय तो भलाई के साथ सम्बन्ध रहता है, पर दूसरे समय में नहीं रहता) अर बुराई नहीं करूँगा तो भलाई का सम्बन्ध नित्य होता (16) है हमारे साथ। इस वास्ते इसकी महिमा ज्यादे(ज्यादा) है। किसी को बुरा नहीं मानूँगा बुरा चाहूँगा नहीं, बुराई  करूँगा नहीं तो भलाई का सम्बन्ध आपके साथ निरन्तर हो ज्यायेगा अर भलाई करणे से निरन्तर सम्बन्ध नहीं होता है। भलाई करे, उतना सम्बन्ध रेहता है जितना खर्च करो तो उतना सम्बन्ध रेहता है, जितना 'सेवा करो' उतना सम्बन्ध रहता है अर बुराई करणे से निरन्तर भलाई रहती है। वो सीम नहीं- असीम होती है और भलाई कर देना, ये बड़ी बात नहीं है क्यूँ आप देखो, आपके द्वारा भलाई होती ही नहींऐसा है ही नहीं। कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं कि उसके द्वारा कुछ भलाई नीं होती हो और कुछ बुराई होती हो। ऐसा कोई है ही नहीं। कुछ कुछ भलाई तो करते ही हैं। अपणे स्त्री बच्चों के साथ करते हैं माता-पिता के साथ करते हैं, भाई-भोजाई के साथ करते हैं, (17) मित्रों के साथ करते हैं, अपणी जाती के साथ करते हैं, बिरादरी के साथ अच्छापणा करते ही हैं, अच्छापणा तो होता ही रहता है, पण बुराई रहित होणा- ये, भोत (बहुत) कम आदमी मिलेगा ऐसा। भलाई करदे, बुराई करदे, भली-बुराई– 'भलाई- बुराई करणेवाला' तो दुनियाँ मिलेगी। ये, द्वन्द्व है ये तो। पर बुराई करणा ही नहीं है [-इसमें ] ना खर्चा करणा पड़ता है, ना उद्योग करणा पड़ रहा है, ना परिश्रम करणा पड़ता, कुछ- कोई विद्या सीखणी पड़ती, नीयत अपणी साफ कर देणी है बस। अर अपणी नीयत साफ हुई (कि) आप साफ हुए। निर्मल- भले हो ज्यायेंगे। इतनी सुगम बात है अर इतनी बड़ी बात है, इतनी दामी बात है। और संसारमात्र की सेवा है। इस नियम पर पक्का रहणा है और भगवान की कृपा का भरोसा रखो। हमारा काम होगा भगवान की कृपा से। और [जो] कृपा का भरोसा रखता है वो कभी फेल नहीं होता। अपणे उद्योग से (18) तो गङबङी हो ज्याती है अपणे बल के कारण; परन्तु भगवान की कृपा के भरोसे से सदा के लिये ठीक हो ज्यायेंगे।

   तो ये तीन बात, पक्की अपणे जीवन में, आज से ही धारण कर लेणा। कभी भूल गये, राम राम राम राम राम राम करके भगवान से माफी माँग लेणामहाराज भूल हो गई, गलती हो गई, अब गलती नहीं करूँगा। ये, सावधान हो ज्यावें अपणे। तो हमारे [में] से  बुराई निकल गई तो बुराई दुनियाँमात्र में मिटगी (मिट गई) "आप भला, तो जग भला" "मन चंगा, तो कठोती गंगा" - कहावताँ है (कहावतें हैं) अपणे में भलापणा स्वयं कायम होगा- बुराई रहित होणे से अर भलाई करणे से सीमित भलाई होती है। ये असीम भलाई (है) किसी का बुरा नहीं करूँगा, किसी को बुरा नहीं समझूँगा, (19) किसी के भी बुराई नहीं सोचूँगा। मन में बुरा सोचना है ना [-यह] भोत, बड़ी भारी बुराई है। करणा बुराई है ही, बुरा मानणा भी बुराई है; पण बुरा सोचना भी भोत बड़ी बुराई है। इस वास्ते बुराई रहित होणा है। तो स्वतः भलाई ज्यायगी आपसे ही (अपने-आप ही) मौज हो ज्यायेगी- आणँद हो ज्यायेगा। ये सत्संग करते हैं- ये सिद्ध हो ज्यायेगी, निर्मलता स्वतः ज्यायगी। इस बात पर पक्के- कायम रहें। कायम रहने के लिये क्या है बस, बुरा नीं, भीतर से बुरा नीं समझूँगा किसी को ही (किसी को भी) अपणे को दूजे को- किसी को बुरा ही नीं समझूँगा बस- ये ही रह ज्यायेगा। बुरा समझने से ना बुराई करेगा, ना बुरा सोचेगा- सब "नहीं" नहीं हो ज्यायगा। बुराई बोलेगा (20) बुराई सुणेगा (और) ही सोचेगा- बुराई के साथ सम्बन्ध ही छूट गया।

तो ईश्वर अंश जीव अविनाशी। चेतन अमल सहज सुख राशी।। जो सहज सुखराशी है सहज ही अमल है शुद्ध है, चेतन है- ये स्वतः स्वरूप रह ज्यायगा है जैसा का जैसा। (रामचरिमा.\११७)  - ईश्वर अंश जीव अविनाशी। चेतन अमल सहज सुख राशी।

{ श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज के दिनांक १७|०७|१९९७_प्रातः बजे, सीकर चातुर्मास वाले प्रवचन का यथावत् लेखन-}